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देश को देंगे अभेद्य हवाई सुरक्षा कवच

वायुसेना सह-अध्यक्ष एयर मार्शल पी के बारबोरा का कहना है कि हम देशवासियों के भरोसे पर खरा उतरना चाहते हैं, कहीं से भी आने वाली कैसी भी चुनौती से निपटने के लिए उन्हें ऐसा हवाई सुरक्षा कवच देना चाहते हैं जिसको कोई भेद न सके और आम लोग बेफिक्र होकर रोजमर्रा का काम करते रहें। हम देशवासियों को पूरी तरह आश्वस्त करना चाहते हैं। वे यह भी मानते हैं कि वायुसेना जो भी कर रही है, उसे जानना जनता का अधिकार है। हाल ही में जब वे ‘हिन्दुस्तान शहीद सम्मान’ समारोह में शिरकत करने बरेली पहुंचे, तो उनसे रूबरू हुए पंकज सिंह।

पाकिस्तान को अमेरिका और अरब देशों से मिल रही मदद से हमारे ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है?
पाकिस्तान को जिस तरह के हथियार और आर्थिक मदद मिल रही है, वह निश्चय ही चिंता का विषय है, क्योंकि इसका प्रयोग भारत के खिलाफ किया जाता रहा है। पाकिस्तान के आंतरिक हालात चिंताजनक हैं ही और इसका भी भारत पर असर पड़ सकता है। 
क्या चीन 1962 को दोहराने की हिमाकत कर सकता है? हमारी क्या तैयारी है?
अब 1962 को नहीं दोहराया जा सकता। तब से अब तक वैश्विक राजनीतिक वातावरण और अंतरराष्ट्रीय मंचों में आमूल-चूल बदलाव आ चुके हैं। ये दोनों ही किसी देश की स्थिरता दिखाने के लिए अहम कारक होते हैं। तेजी से बदल रहे सामरिक परिदृश्य के मद्देनजर हमें भी उसी रफ्तार से तैयारियां करनी होती हैं, यही हम कर रहे हैं। हमारे पास भी अत्याधुनिक घातक हथियार हैं। हम नए लड़ाकू विमान और रक्षा उपकरण खरीद रहे हैं। भारतीय वायुसेना ने देशवासियों से जो वादा किया उसे पूरा कर रहे हैं।

हाल ही में वायुसेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल पी. वी. नाईक ने कहा था कि हमारे 50 फीसदी हथियार, उपकरण व विमान पुराने हैं। क्या यह चिंताजनक नहीं है?
विमान फ्लीट की संख्या अभी कुछ घटी है, लेकिन वायुसेना की क्षमता में कोई कमी नहीं आई है। हम अब मिग 21 लड़ाकू विमानों के स्थान पर आधुनिक सुखोई विमान ला रहे हैं। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों और उपकरणों को खरीदने के लिए हम तैयार हैं। वायुसेना संख्या के बजाय क्षमता बढ़ाने पर अधिक ध्यान देती है। इन उपकरणों के वायुसेना में शामिल होने से हमारी मारक क्षमता और बढ़ी है।

यह आशंका जताई जा रही है कि भविष्य में हमें एक साथ दो मोर्चो पर, यानी चीन और पाकिस्तान से जंग लड़नी पड़ सकती है। इसे देखते हुए हमारी तैयारी?
भविष्य की तैयारियों के चलते ही वायुसेना ने सी-17 और सी-130 जैसे परिवहन विमान खरीदे हैं। ये महंगे जरूर हैं लेकिन समय के अनुरूप हैं। अभी हम जिन रूसी ए एन-32 और आई एल-76 परिवहन विमानों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे 50 और 60 दशक की पुरानी प्रौद्योगिकी के हैं। जो विमान हम आज खरीद रहे हैं, वे ताजातरीन टेक्नोलॉजी के हैं। बेशक हम किसी देश या क्षेत्र विशेष को ध्यान में रख कर तैयारियां नहीं कर रहे, लेकिन किसी भी मोर्चे से आने वाली हर चुनौती से निपटने के मकसद से तैयारियां हो रही हैं।

क्या विदेशी हथियारों पर निर्भरता हमारा जोखिम नहीं बढ़ाती?
हमें किसी भी तरह के दबाव में नहीं आना चाहिए। जब-जब भी हम पर प्रतिबंधात्मक दबाव डाले गए, हम और उभरकर सामने आए। प्रतिबंध के दौर में ही हमने अपनी स्वदेशी प्रणालियां विकसित कीं और जरूरत पड़ेगी तो आगे भी कर सकते हैं। हमारे यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है। यहां तक कि अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा समेत तमाम महत्वपूर्ण संस्थानों में भारतीय वैज्ञानिकों और प्रोफेशनल लोगों की धूम हैं। हमारे पास दिमाग है, लिहाजा हमें स्वदेशीकरण पर अधिक जोर देना होगा। इससे एक ओर जहां हमारी दूसरों पर निर्भरता कम होगी, वहां जरूरी उपकरण कम कीमत पर उपलब्ध हो सकेंगे।

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