DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

प्रेरणा के दीप

प्रेरणा के दीप

कुछ लोग जीते जी समाज के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। वे अपने दुखों के लिए ईश्वर को नहीं कोसते, वे कर्म में विश्वास रखते हैं। कुछ दिन बाद दीपावली है। इस मौके पर आशीष कुमार ‘अंशु’ ऐसे ही कुछ लोगों से आपकी मुलाकात करा रहे हैं, जिन्होंने अपनी विकलांगता को कभी दूसरों की सहानुभूति की वजह नहीं बनने दिया, बल्कि अपने परिश्रम से लोगों के लिए मिसाल बने।

खुद को तिल-तिल जलाकर समाज को रोशन किया
राजेन्द्र जौहर

बिस्तर से नहीं उठ सकते, पर मदद को तत्पर किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में थेरेपिस्ट राजेन्द्र जौहर की जिन्दगी लखनऊ में मजे में गुजर रही थी। सन् 1986 में कुछ हथियार बंद लुटेरे घर में घुस आए। उनसे लड़ते हुए इन्हें गोली लगी। गोली की चोट ऐसी थी कि उसके बाद कभी बिस्तर से उठ न सके। एक समय था, जब वह जीवन से पूरी तरह निराश हो गए थे। पूरा दिन टीवी देखते हुए या फिर रोते हुए गुजरता। इन सबके बाद उन्होंने तय किया कि रोने धोने से काम नहीं चलेगा। बिस्तर से उठ नहीं सकते थे, मगर सुन सकते थे, देख सकते थे और दो उंगलियां काम नहीं थीं तो क्या तीन उंगलियां काम तो कर रही थीं। इस तरह राजेन्द्र जौहर की नई जिन्दगी की शुरुआत की, संस्था बनाई ‘फैमिली ऑफ डिसेबल्ड’ (एफओडी)। मकसद- समाज के उन लोगों में चेतना और विश्वास जगाना जिन्होंने किसी प्रकार की विकलांगता की वजह से अपना आत्मविश्वास कम कर लिया है या बिल्कुल गंवा दिया है। जौहर ऐसे लोगों के लिए कभी अभिभावक बन जाते हैं तो कभी दोस्त। उनकी मदद से कई विकलांग लोगों का कारोबार प्रारंभ हुआ। वे निराश हो चुके थे लेकिन आज मजे से अपना व्यवसाय चला रहे हैं। एफओडी नव उद्यमियों को व्यवसाय आगे बढ़ाने की सलाह भी देता है। जौहर साहब ने 1992 में भारत में विकलांगता पर पहली पत्रिका ‘वॉयस ऑफ एफओडी’ निकाली। अपनी पत्रिका के लिए लेख लिखने और उसे संपादित करने का काम वह स्वयं करते हैं। जौहर बिस्तर पर बैठे-बैठे ही फोन के माध्यम से अपना दफ्तर देखते हैं। उनका घर-दफ्तर दोनों साथ-साथ दिल्ली के जनकपुरी में है। जौहर जैसे लोग हम सबके जीवन में जीते-जागते प्रेरणा के दीप हैं।

प्रदीप राज
समाज के लिए प्रेरणा

प्रदीप राज का नाम पारा ओलम्पिक के खिलाड़ियों के बीच जाना पहचाना है। इसलिए अपने कोच से लेकर चयन समिति तक का चहेता रहा है। दो साल की उम्र में ही पोलियो का शिकार हो गया। वह अपने पांव पर खड़ा नहीं हो सकता था। घर वालों ने उसका नामांकन एक स्पेशल चिलड्रन स्कूल ‘अमर ज्योति’ में करा दिया। लेकिन प्रदीप तो स्पेशल नहीं, उस स्कूल में पढ़ना चाहता था, जिसमें उसकी उम्र के बाकी बच्चे पढ़ रहे थे। यह उसके आत्मविश्वास का ही कमाल था कि उसने सातवीं कक्षा से आगे की पढ़ाई ऐसे ही एक स्कूल में की। साथी छात्र हों या शिक्षक, सभी उसे सहानुभूति की नजर से देख रहे थे। यह उसे कतई पसंद नहीं था। वैसे भी यह पढ़ाई का सिलसिला लंबा नहीं चला। प्रदीप कॉलेज की पढ़ाई पैसों के अभाव में नहीं कर पाया।

प्रदीप को एक नौकरी की तलाश थी। वह आर्थिक स्तर पर अपने पांवों पर खड़ा होना चाहता था। यहां उसकी मदद के लिए उसका पुराना स्कूल अमर ज्योति सामने आया। उसने वहां 2007 में स्पोर्ट्स टीचिंग क्लास लेनी शुरू की। इसके बाद उसे एक बीपीओ में काम मिल गया। इस नौकरी के साथ-साथ प्रदीप ने अपने जैसे बच्चों के बीच जागरूकता कार्यक्रम करने शुरू किए। उन्हें उनके अधिकार के लिए जगाने का काम किया। तमाम तरह की परेशानियों के बीच उसने एक चीज कभी नहीं छोड़ी- टेबल टेनिस का अभ्यास। वह एक अच्छा खिलाड़ी है। वह देश के लिए कई स्वर्ण पदक लेकर आया। और वह खुद ही नहीं लाया, अपने प्रशिक्षण में कई ऐसे खिलाड़ी तैयार किए जो बाहर खेलने गए और उन्होंने जीत हासिल की।

संजना गोयल
अपना गम भूलकर बांटती हैं खुशियां

संजना गोयल छोटी सी उम्र में ही एक ऐसी बीमारी की शिकार हो गई, जिसका इलाज मेडिकल साइंस के पास भी नहीं है। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी धीरे-धीरे बढ़ने वाला रोग है जो अपनी जद में लेकर रोगी को लाचार बना देता है। संजना के अनुसार इस वक्त देश में लगभग दस लाख लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं और इनको सरकार से भी कोई खास सुविधा नहीं मिल रही है। जबकि सरकार को चाहिए कि इस बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए रोजगार की व्यवस्था करे, जिससे वे अपने जीवन यापन करें और आत्मनिर्भर हो सकें।

आज इस लाइलाज बीमारी से संजना न सिर्फ खुद लड़ रहीं हैं बल्कि ‘इंडियन एसोसिएशन ऑफ मस्कुलर डिस्ट्रॉफी’ संस्था के माध्यम से इस बीमारी से लड़ रहे लोगों का हौसला भी बढ़ा रही हैं। इस संस्था के साथ इस समय दस हजार से भी अधिक मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के मरीज जुड़े हुए हैं। 2004 में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने दिल्ली में मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ितों के बीच काम करने के लिए संजना को सम्मानित किया। फिर 2008 में हिमाचल के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने उन्हें समाज सेवा के लिए सम्मानित किया। हिमाचल के सोलन की संजना स्कूली के दिनों को याद करती हुई कहती हैं, ‘पहाड़ पर बने राजकीय कन्या विद्यालय तक जाने में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। साथी पन्द्रह से बीस मिनट में पहुंच जाते थे, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी की वजह से वहीं तक पहुंचने में मुझे डेढ़ से दो घंटे लगते थे।’

संजना मानती हैं कि आर्थिक तौर पर संपन्न परिवार में जन्म होने की वजह से इस मोर्चे पर उन्हें अधिक परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। छह भाई-बहनों के परिवार में संजना के दो भाई अतुल और विपुल इसी रोग से लड़ रहे हैं। इस रोग से लड़ते हुए संजना और उनके भाइयों ने सोलन के व्यवसायी समाज में अपनी एक जगह बनाई है। अब तो संजना को अपने व्यवसाय से भी अच्छी आमदनी हो जाती है। सोलन में उनका अपना एक बुटिक है। अब उन्हें खुद से अधिक चिन्ता उन गरीब बच्चों की है जो मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित हैं। उनके परिवार वाले भी मौत को इन बच्चों के धीरे-धीरे करीब आते हुए देखने के अलावा कुछ भी नहीं कर पाते। आज संजना ऐसे बच्चों और उनके परिवार के लोगों में काउंसलिंग के जरिए आत्मविश्वास भरने का काम कर रहीं हैं। उनकी संस्था आईएएमडी ऐसे मरीजों और उनके परिवार वालों के लिए जागृति, साथी, सहारा, पुनरुत्थान, विंग्स, पुर्नसजीवन, गुरुकुल, संपर्क जैसी परियोजनाएं चला रही है, जिनमें अधिकांश स्वरोजगार से जुड़ी हैं। संजना आईएएमडी के माध्यम से किए काम के बदले एक पैसा नहीं लेती। दिल्ली, चंडीगढ़, गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, आन्ध्र प्रदेश और तमिल नाडू में आईएएमडी की शाखाओं में काम कर रहे लोग अपनी मेहनत के बदले संजना से कोई पारिश्रमिक नहीं मांगते। सभी शाखा प्रमुख मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित हैं। संजना चाहती हैं कि इस रोग से पीड़ित जब तक जिएं, आत्मसम्मान के साथ आत्मनिर्भर होकर जिएं। वे आठों पहर ऐसे लोगों की मदद के लिए तत्पर हैं। संजना बाबा रामदेव के संपर्क में हैं। बाबा ने आश्वासन दिया है कि पतंजलि योगपीठ इसका इलाज जल्द ही तलाश लेगा। संजना ने अपनी तकलीफ को मस्कुरल डिस्ट्रॉफी से पीड़ित लाखों लोगों के साथ जोड़ लिया है.. और इस तरह वह अपना दर्द भूल गईं।

मोहम्मद गुलजार सैफी
गली से ऑस्कर तक

माता-पिता ने छठी संतान मोहम्मद गुलजार सैफी के जन्म पर खूब खुशियां मनाई गईं क्योंकि मान्यता है कि छह बच्चे बुढ़ापे की छह बैसाखियां होते हैं। पर ये खुशियां छह महीने भी नहीं टिक पाईं। छठे महीने ही सबको मालूम पड़ गया कि गुलजार को पोलियो है और कभी अपने पांव पर ठीक से खड़ा नहीं हो पाएगा। परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। खबर सुनते ही बुजुर्ग पिता ने मानसिक संतुलन खो दिया और बीमार रहने लगे। परिवार की पूरी जिम्मेदारी मां के पर आ गई।

यह गुलजार का बीता हुआ कल है। आज वह अपने शहर मेरठ में जाना-पहचाना चेहरा हैं। उनसे मिलने के लिए देश के दूसरे हिस्सों से लोग आते हैं। उन्होंने अमेरिकी फिल्मकार ईरीन टेलर ब्रोदस्की की पोलियो पीड़ितों पर केन्द्रित 38 मिनट की एक डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म ‘द फाइनल इंच’ में मुख्य भूमिका निभाई। दुनियाभर के अखबारों में उनके बारे में खूब छपा है। पिछले साल इस डॉक्यूमेन्ट्री को ऑस्कर के लिए लघु फिल्म की श्रेणी में नामांकन भी मिला। यह फिल्म देश भर में पोलियो के दर्द को बयां करती है। इस फिल्म के लिए गुलजार कई अर्थाे में सच्चे पात्र नजर आते हैं और निर्देशक की सही पसंद भी। सबसे पहले वे पोलियो से पीड़ित होने के बावजूद अपने पोलियो का रोना नहीं रोते। वह आत्मनिर्भर हैं। छोटे बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं। दूसरी बात वह एक ऐसे राज्य उत्तर प्रदेश से आते हैं, जहां सबसे अधिक पोलियो के मामले प्रकाश में आए हैं। 2008 में देशभर में 549 में से 297 मामले उत्तर प्रदेश के थे। तीसरी बात वह जिस मुस्लिम समाज से आते हैं, उसमें पोलियो की खुराक को लेकर सबसे अधिक भ्रम आज भी बना हुआ है। गुलजार के अनुसार- ‘पोलियो का कोई धर्म-मजहब नहीं होता। वह सभी लोगों के लिए बराबर तौर पर खतरनाक है।’

क्षमा
दर्द को बनाया कूची का रंग

क्षमा की उम्र होगी यही कोई तीस साल के आसपास। लेकिन आप उनसे मिलेंगे और जब तक आपको कोई उनकी उम्र का हिसाब ना बताए, आप उनकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकते। दस से भी अधिक साल पहले एक दुर्घटना में उन्होंने अपने चलने की क्षमता गंवा दी और आजीवन आठों पहर के दर्द को गले लगा लिया। दर्द भी इतना भयानक कि इंसान होश खो दे। इस दौरान ‘आर्ट थेरेपी’ ने इस दर्द से बाहर निकलने में क्षमा की बड़ी मदद की। ‘आर्ट थेरेपी’ क्षमा की एक किताब का नाम भी है, जो शीघ्र प्रकाशित होने वाली है। इसमें क्षमा ने इस बात का उल्लेख किया है कि दर्द को कला के माध्यम से कैसे कम किया जा सकता है। जैसे ही उन्होंने अपनी तस्वीर पूरी की, वह वेदना से भर उठती हैं। दर्द जब हद गुजरने लगता है, पापा कुसुमेन्द्र कुलश्रेष्ठ आकर इंजेक्शन लगा देते हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:प्रेरणा के दीप