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राजस्थान में बनेगा पोखरण से बड़ा फायरिंग रेंज

राजस्थान के सीमावर्ती एवं मरुस्थलीय जैसलमेर जिले में पोखरण के बाद अब शाहगढ़ वल्ज में सेना का उससे भी बड़ा युद्धभ्यास तथा परमाणु परीक्षण (फील्ड फायरिंग रेंज) विकसित किया जा रहा है। जिला कलेक्टर डॉ रवि कुमार सुरपुर के अनुसार प्रस्ताविज रेंज के लिए सेना को भूमि आवंटित करने की प्रक्रिया चल रही है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार जैसलमेर जिले में आबादी कम होने के कारण यह सेना के शस्त्र परीक्षण तथा युद्धाभ्यास के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। इसीलिए यहां यह दूसरा रेंज बनाया जा रहा है। सैन्य सूत्रों के अनुसार भारतीय सेना के समक्ष खड़ी नई चुनौतियों को देखते हुए उसे अत्याधुनिक हथियारों तथा उपकरणों से तो सुसजित कर दिया गया है लेकिन फिर समस्या यह पैदा हुई कि इनका परीक्षण तथा तत्संबंधी युद्धाभ्यास कहां किया जाएगा, क्योंकि पोखरण रेंज इसके लिए अब पर्याप्त नहीं रह गया है। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए शाहगढ वल्ज क्षेत्र में पोखरण से भी बड़ा रेंज बनाया जा रहा है। रक्षा मंत्रालय पिछले काफी समय से मरुस्थलीय पृष्ठभूमि वाले क्षेत्र में एक नई रेंज की तलाश कर रहा था तो उसकी निगाहें विश्व के दूसरे सबसे बड़े क्षेत्रफल वाले मरुस्थलीय जिले जैसलमेर पर जा लगी है। करीब साढ़े अड़तीस हजार वर्ग किमी में फैले सीमावर्ती जिले में आबादी नाम मात्र की है। हालांकि जैसलमेर जिले में सेना का पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज पहले से ही है। लेकिन बदली परिस्थितियों तथा रेगिस्तानी क्षेत्र में सामरिक क्षमता को मजबूत करने की आवश्यकता को देखते हुए जिले के शाहगढ़ बल्ज क्षेत्र को नई रेंज के लिए उचित माना गया। इसके बाद रक्षा मंत्रालय ने यहां नई रेंज की स्थापना का निर्णय लिया। वर्ष 2003 में रेंज आवंटन की प्रक्रिया शुरु की गई जो अब अंतिम चरण में हैं। हालांकि रेंज आवंटन के लिए कई प्रकार की आपत्तियां सामने आ रही हैं। ग्रामीणों द्वारा विरोध भी किया जा रहा है। लेकिन राय सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस मसले में भूमि आवंटन को हरी झण्डी दे दी है। जिला प्रशासन मुआवजे का पूरा ब्यौरा सैन्य बोर्ड को भेज चुका है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार सेना को रेंज के लिए कुल नौ लाख 65 हजार बीघा भूमि आवंटन की प्रक्रिया चल रही है। जिसमें करीब साढ़े पांच लाख बीघा राजस्व भूमि तथा करीब चार लाख बीघा उपनिवेशन भूमि है। इसके अलावा राजस्व क्षेत्र के 30 गांव आते हैं। इनमें से 23 गांव गैर आबाद है। बाकी गांवों के 23 परिवारों में मात्र 456 लोग हैं। रेंज में पड़ने वाले उपनिवेशन क्षेत्र में 11 लाख राजस्व गांवों एवं तीन चकों में बसे हुए 30परिवारों की आबादी मात्र 1341 है। इस तरह छितरी हुई ढाणियां तथा गिने चुने गांवों में नाममात्र की आबादी होने के कारण सैन्य प्रदर्शन तथा युद्धाभ्यास के लिए यह क्षेत्र माकूल है। सूत्रों के अनुसार रेंज क्षेत्र में पड़ने वाली खातेदारी भूमि तथा आबादी भूमि का नियमानुसार मुआवजा देने के लिए सरकार द्वारा निर्धारित दरों के अनुसार करीब 5.50 अरब की राशि रक्षा मंत्रालय को चुकानी पड़ेगी। उसमें राजस्व एवं आबादी भूमि के 24 करोड़ उपनिवेशन की राजकीय आबादी एवं खातेदारी भूमि के करीब तीन अरब 30 करोड़ रुपए तथा इंदिरा गांधी नहर परियोजना के स्थानांतरण के लिए करीब दो अरब रुपए का भुगतान किया जाएगा। भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही के लिए सर्वेक्षण दल गठित करने की प्रक्रिया चल रही है। पूर्व विधायक गोवर्धन कल्ला कहते हैं कि इस क्षेत्र में तेल कंपनियों को कई ब्लाक आवंटित पहले ही किए जा चुके हैं तथा क्षेत्र में गैस के विपुल भण्डार होने की संभावना बताई जा रही है। इसके अलावा इस क्षेत्र में चार लाख बीघा नहरी भूमि है जिसमें 1600 मुरब्बे आवंटित किए जा सकते हैं। इन मुरब्बों में नहरी खेती हो सकती है। कल्ला ने कहा कि इसको देखते हुए इस क्षेत्र को रेंज के रूप में आवंटित नहीं किया जाना चाहिए। यदि इस क्षेत्र में रेंज आवंटित होती है भी है तो कम से कम उपनिवेशन की नहरी भूमि को रेंज क्षेत्र से बाहर निकालना चाहिए। इसी तरह पंचायत समिति के सदस्य निहाल खान कहते हैं कि शाहगढ़ क्षेत्र में छितरी हुई ढाणियां हैं। कम आबादी वाले छोटे छोटे गांव है। इसके अलावा नहरी भूमि को रेंज क्षेत्र से बाहर निकालना चाहिए ताकि यहां के लोगों को नहरी भूमि आवंटित हो सके और वे यहां काश्तकारी कर सकें।

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