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पहली कमाई और दिवाली

पहली कमाई और दिवाली

आधे पैसे माता-पिता को भेजे
मनोज बाजपेयी

कॅरियर के कई साल बहुत स्ट्रगल में बीते हैं। इसलिए इस दौरान जोरदार दिवाली मनाने का मौका बहुत कम मिला था। पहली बार फिल्म ‘सत्या’ ने मुझे यह खुशी दी थी। इस फिल्म के लिए साइनिंग अमांउट के तौर पर मुझे 25 हजार रुपए मिले थे, जो उस समय मेरे लिए पच्चीस लाख के बराबर थे। उनमें से आधे से ज्यादा रुपए मैंने दिवाली पर अपने मां-बाबूजी को भेज दिया था। अपने लिए कुछ अच्छे कपड़े लिए थे। अपने कुछ स्ट्रगलर दोस्तों को आर्थिक मदद दी थी। यह एक अच्छी बाद हुई कि इस दिवाली के बाद मुझे बहुत ज्यादा मितव्ययी होने की जरूरत नहीं पड़ी। मेरे छोटे-छोटे सपने पूरे होने लगे थे। जब आप जीविका के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं, तो ऐसी छोटी-छोटी खुशियां बहुत मायने रखती हैं। जेब में पैसे न हों, तो दिवाली कैसी? आज मैं आर्थिक समस्या से पूरी तरह से उबर आया हूं, फिर भी दिवाली से पहले किसी बड़ी खुशी का इंतजार रहता है। जैसे कि इस साल ‘राजनीति’ की  सफलता ने मुझे दोहरी खुशी दी है। फिर मेरे यहां एक नया मेहमान आने वाला है, यह भी मेरे लिए एक बड़ी खुशी की बात है।

चालीस हजार का चेक अब तक याद है
कंगना रणावत

कहावत है- दिवाली दीवाला निकाल देती है। मैं इस कहावत को मानती हूं। दिवाली का मौका हो, तो खर्च करने के मामले में आप आगे-पीछे कुछ नहीं देखते हैं। वैसे भी मैं बहुत खुले हाथ से खर्च करती हूं। मुझे याद है पांच-छह साल पहले एक एड फिल्म के लिए मुझे चालीस हजार रुपए का एक चेक मिला था। मैंने कई दिनों तक यह राशि खर्च नहीं किया। इसे खर्च करने के बारे में सोचती रही। दिवाली एक माह बाद आने वाली थी। मैं अपनी फैमिली को बहुत मिस कर रही थी। इसलिए मैंने तय किया कि दिवाली पर यह सारा पैसा उन पर खर्च करूंगी। मम्मी-डैडी और भाई-बहन के लिए कपड़े आदि खरीदे और जाने की तैयारी करने लगी। पर दिवाली से ठीक एक दिन पहले मेरी शूटिंग निकल आई। मैं शूटिंग की परवाह न करके दो-चार दिन के लिए परिवार से मिलने चली आई। घर जाकर मैंने दिवाली को एंजॉय किया। यहां आई तो पता चला कि दिवाली से पहले होने वाली मेरी शूटिंग कैसिंल हो गयी थी। और वो लोग मेरा ही इंतजार कर रहे थे। सच, जब आप साथ खुशियां मनाने के बारे में सोचते हैं, तो सब कुछ आसान होता चला जाता है। जब मेरी गैगस्टर हिट हुई थी, मैंने पूरे दो माह पैसे को बचा कर रखा था, ताकि घर जाकर शानदार दिवाली मना सकूं। आज मुझे पर्याप्त पैसे मिल रहे हैं, हर त्योहार अच्छी तरह से मना रही हूं। लेकिन तंगहाली की अपनी कुछ दिवाली को मैं आज भी भूल नहीं पाई हूं। असल में जब स्ट्रगल कर रहे होते हैं, पैसे का मोल कुछ ज्यादा बढ़ जाता है।
प्रस्तुति-असीम चक्रवर्ती

गौरी को उसका पसंदीदा ड्रेस खरीदकर दिया था
शाहरुख खान

पैसों की तंगी का सामना मुझे बहुत ज्यादा नहीं करना पड़ा है। मां बराबर मुझे पॉकेटमनी के पैसे देती रहती थी। फिर सीरियल आदि में काम करके भी मुझे पैसे मिलते रहते थे। इसलिए दिवाली पर हम दोस्तों के साथ खूब मौज-मस्ती करते थे। लेकिन वह खुशी और थी। मुझे याद है दिवाली से दो-तीन महीने पहले जीपी सिप्पी साहब की फिल्म ‘राजू बन गया जेंटिलमैन’ साइन की थी। इसके साइनिंग अमाउंट से मैंने दिवाली के मौके पर अपने दोस्तों को खूब उपहार खरीद कर दिए थे। गौरी को उसका पसंदीदा ड्रेस खरीद कर दिया था। दिवाली हमेशा ही मेरा फेवरेट फेस्टिवल रहा है। राजू भले ही मेरी पहली रिलीज फिल्म नहीं थी, पर यह मेरी पहली साइन की हुई फिल्म थी। आज भी दिवाली के दिन इस फिल्म से मिले पैसों की याद आ जाती है। और मैं फिर से उन पैसों का हिसाब-किताब करने लगता हूं। तब लगता है मेरे द्वारा कमाए गए अब तक के सारे पैसों का उपयोग इसी पैसे से हुआ था, क्योंकि तब मैं बहुत सपन्न नहीं था, बावजूद इसके मैंने खुले मन से दिवाली पर इन पैसों को अपने लोगों पर खर्च किया था।

नोटों की उस गड्डी से सभी खूब खुश हुए
कैलाश खेर

मैं 12-13 साल का था। तभी मैंने थोड़ा कमाना शुरू कर दिया था। अपने माता-पिता, छोटी बहन के लिए कुछ करने की बेचैनी रहती थी। मैंने थोड़े-थोड़े पैसे बचा-बचाकर दो और पांच रुपए की गड्डी पूजा के लिए मां-पिताजी को दी थी। मैं तो खूब खुश था ही, घर में सभी लोग बहुत खुश थे। उस खुशी में अलग ही उत्साह था। उसे बयान नहीं किया जा सकता। आज इतना धन कमाते हैं और लग्जरी जिंदगी जीते हैं, फिर भी वह खुशी नहीं मिलती। मां के लिए साड़ी और पिताजी के लिए धोती आदि तो खरीद ही चुका था और इस अवसर पर उन्हें ये सारे सामान मिलते ही थे, लेकिन उस वर्ष साड़ी और धोती के साथ चांदी के गणपति और नोटों की गड्डी घर में बड़ी खुशी की खास वजह थी। पटाखेबाज तो मैं नहीं था, लेकिन कैंडलबाज जरूर था। खूब मोमबत्तियां और सरसों तेल के दीए जलाता था। दीए के लिए पिताजी सरसों तेल का टिन खरीद लाते थे और सरसों तेल से खूब दीपक जलाते थे। बड़ा आनन्द आता था और काफी खूशी महसूस होती थी। लेकिन अब उसमें कमी आई है क्योंकि उनकी जगह नकली चीजों ने ले ली है। ये चीजें उतना उत्साहित-उत्तेजित नहीं करतीं। 
-सत्य सिंधु

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