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सुरक्षित भविष्य से आबादी नियंत्रण

जनसंख्या स्थिरता कोष का गठन करके स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस बात को बल देने की कोशिश की है कि इस देश में बढ़ती हुई जनसंख्या को काबू करने की नितांत आवश्यकता है। भारत की जनसंख्या इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है, इसके कई ऐतिहासिक और वर्तमान कारण हैं, खासतौर से उन पिछड़े राज्यों में जहां कुल जन्म दर अभी भी जनसंख्या की विस्थापन दर से अधिक है।

जनसंख्या अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि उच्च जन्म दर का कारण माता-पिता की यह सोच है कि कुछ बच्चे मर भी सकते हैं। माता-पिता इस बात से अकसर सहमे रहते हैं कि एक बच्चा उनके बुढ़ापे का सहारा बन भी पाएगा या नहीं। इसी डर के चलते वे ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं, क्योंकि यदि उनमें से कुछ की मौत भी हो जाए तो कुछ बच्चे तो जिंदा रहेंगे ही।

इसे सही तरीके से समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी समझ में समस्या का समाधान भी निहित है। हमें अब ऐसे रास्ते की तलाश करनी होगी, जो इनकी बुढ़ापे की असुरक्षा को दूर करने के साथ-साथ उन्हें इस बात का भी विश्वास दिला सके कि उन्हें ज्यादा बच्चे पैदा करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनका बुढ़ापा तो पहले से ही सुरक्षित है।

एक आकलन के अनुसार निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में एक बच्चे के जन्म से लेकर उसके 20 साल की उम्र तक 10 लाख रुपए की लागत आती है। इस खर्च को माता-पिता, सरकार और समाज वहन करता है। अंतत: इस लागत का वास्तविक वहन तो देश करता है। यह लागत प्रत्येक नए जन्म लेने वाले बच्चे के साथ जुड़ती जाती है। एक बच्चे के साथ जुड़ने वाली इस लागत का उपयोग अन्य दूसरे कार्यो जैसे शिक्षा को मजबूती प्रदान करने, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक विनिर्माण आदि के लिए किया जा सकता है। यह रकम पूरे देश के लिए एक अपॉरच्यूनिटी कॉस्ट के समान है।

इस लिहाज से यदि किसी परिवार में तीन बच्चे हैं, तो उस पर देश का खर्च 30 लाख रुपए बैठता है। यदि पहली या दूसरी संतान के जन्म के बाद हम माता-पिता के बंध्याकरण की सहमति पर उन पर एक लाख रुपए का निवेश करें, तो हम 10 लाख रुपये प्रति बच्चा बचा लेंगे।

नई पेंशन योजना या अन्य दूसरी नामी वित्तीय संस्थानों में किया गया यह एक लाख का निवेश अगले 20 वर्षो में बढ़कर करीब 10 लाख हो जाएगा। 20 साल के बाद वित्तीय संस्थान माता-पिता को इस जमा रकम पर ब्याज देना शुरू करेंगे। इस जमा रकम पर कोई व्यक्ति साल में एक लाख रुपए पूरे जीवनभर प्राप्त कर सकता है। जैसे ही माता-पिता 60 साल की आयु पूरी करेंगे, इस स्कीम के तहत पूंजी उन्हें वापस करने की सुविधा प्रदान की जाएगी।

इस योजना की खासियत यह है कि माता-पिता को सालाना एक निश्चित रकम मिलती रहेगी। इससे उनकी वृद्धावस्था अधिक सुरक्षित रहेगी, बनिस्बत उनके, जिनके पास ज्यादा बच्चे हैं। ऐसे राज्य जहाँ अभी भी एक परिवार में औसतन तीन बच्चे हैं, जैसे-जैसे वे इस सुरक्षा आवरण से जुड़ते जाएंगे, हम प्रत्येक परिवार में एक अतिरिक्त बच्चों के जन्म को रोक कर जनसंख्या को स्थिर कर सकते हैं।

इस व्यवस्था की एक खासियत यह भी है कि दो बच्चों के फलने-फूलने और परवरिश के लिए एक बेहतर माहौल बनेगा। माता-पिता बच्चों की सही तरीके से देखभाल करने में सक्षम हो सकेंगे। दुर्भाग्यवश यदि ये बच्चों अकाल मौत के शिकार भी हो जाते हैं, तो माता-पिता की वृद्धावस्था सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

यहां महत्वपूर्ण यह होगा कि बंध्याकरण के बाद माता-पिता के नाम जमा की जाने वाली राशि कितनी हो। यह योजना कुछ इस तरह की होगी -

योजना की शुरुआत करते हुए सरकार चार राज्यों में बीपीएल परिवार के एक लाख लोगों को प्रतिवर्ष लक्ष्य के रूप में रख सकती है। प्रत्येक राज्य पर इसका सालाना खर्च 1000 करोड़ रुपए होगा। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह खर्च देश के उस कई गुना खर्च को बचा पाने में सक्षम है, जो जन्मे हुए बच्चों के लालन-पालन पर खर्च होता है।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक यदि कुल जन्म दर 3 है और हम एक लाख लोगों के बंध्याकरण में सफल हो जाते हैं, तो एक बच्चे पर दस लाख और दो बच्चों पर 20 लाख रुपए की बचत होती है। इसका औसत प्रति जोड़ा 15 लाख रुपए होता है यानी चारों राज्य मिलाकर अगले 20 वर्षो में देश के 60 हजार करोड़ रुपए बचा पाने में सक्षम होंगे।

हर साल 3 हजार करोड़ की बचत होगी। 60 हजार करोड़ रुपए एक परिकल्पना पर आधारित राशि प्रतीत होती है, जिसे भविष्य में व्यय किया जाना है, लेकिन खर्च तो इसे होना ही है। इस राशि को हम बच्चों की बेहतर जिंदगी के लिए खर्च कर सकते हैं, जैसे - टीकाकरण, पीने का पानी, सफाई व्यवस्था, डॉक्टर, नर्स, अस्पताल, दवा, स्कूल, शिक्षक, किताबें, ट्रांसपोर्ट आदि।

जनसंख्या स्थिरता कोष के मुताबिक शिक्षा के अधिकार के तहत महत्वपूर्ण जरूरतें हैं- 13.3 लाख नए शिक्षक, 33,405 पक्के स्कूल, 27 हजार कच्चे स्कूलों का नवीनीकरण, सात लाख लड़कियों के लिए शौचालय और 3.4 लाख स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा। शिक्षा के अधिकार के तहत अगले पांच वर्ष में उत्तर प्रदेश में अनुमानित खर्च 38 हजार करोड़ रुपये है, वहीं बिहार में 26 हजार करोड़ रुपये।

दूसरी तरफ राष्ट्रीय सलाहकार परिषद भी शहरों के स्लम में रहने वालों और गाँवों में बी.पी.एल. के अंतर्गत आने वाले परिवारों के लिए 91 हजार करोड़ रुपए की खाद्य सब्सिडी पर विचार कर रही है। मैं अपने लोकसभा क्षेत्र कुरुक्षेत्र में इस बात के लिए प्रयासरत हूं कि लड़कियों को कम से कम हाई स्कूल तक की शिक्षा अवश्य मिलनी चाहिए। लड़कियों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल और लड़के की 21 साल होनी चाहिए। शादी के बाद बच्चों के बीच 3-4 साल का अंतराल होना चाहिए। ये कुछ ऐसे महत्वपूर्ण उपाय हैं, जिस पर आवश्यक रूप से हम काम कर सकते हैं।

पर फिलहाल तो माता-पिता की आर्थिक सुरक्षा का मामला सबसे महत्वपूर्ण है। इसके लिए अगर हम ठोस कदम उठाते हैं, तो निश्चित तौर पर 20 साल बाद माता-पिता आर्थिक रूप से सुरक्षित भी रहेंगे और ये जनसंख्या स्थिरीकरण की दिशा में एक कारगर और ठोस कदम भी साबित होगा।

लेखक प्रसिद्ध उद्योगपति और संसद सदस्य हैं

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