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कभी अड़ो मत

वह अपने एक साथी को लगातार समझाए जा रहे थे, लेकिन उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वह अपनी बात पर अड़ा पड़ा था। आखिर में वह गुस्से में बोले, ‘इतने अड़ियलपन से तो तुम्हारा कुछ भी नहीं होगा।’

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के साइकियाट्रिस्ट जेराल्ड न्यूस्ताद का मानना है कि अगर हम लचीले नहीं बनते हैं, तो अपना ही नुकसान करते हैं। हम कभी कायदे के टीम लीडर नहीं बन सकते।

लचीला होना बेहद जरूरी है। उसके बिना हम टीम नहीं चला सकते। अगर हम हर चीज पर अड़े ही रहेंगे, तो टीम भी अड़ी रह जाएगी। असल में हम जब अड़ते हैं, तो कहीं पर हम भी अड़े रह जाते हैं। टीम पर ही नहीं खुद हम पर भी उसका असर पड़ता है।

हम अगर कहीं अटके रह जाएंगे, तो किसका नुकसान करेंगे? असल में हम चाहते यह हैं कि खुद तो अड़े रहें, लेकिन दूसरे लचीले बने रहें। हम नहीं चाहते कि हमारे सामने कोई अड़ा खड़ा रहे। हमें अच्छा लगता है, जब कोई हमारे सामने लचीला बर्ताव करता है, लेकिन हम खुद दूसरे के सामने अड़े रहना पसंद करते हैं। अपने लिए एक चीज और दूसरे के लिए कुछ और।

असल में अड़ने का मतलब है कि हमने एक चीज पर अपनी राय बना ली है। उस पर सोचने को हम तैयार नहीं हैं यानी हमने जो राय बना ली, वही सच है। फिर चाहे कुछ भी हो। यह सोच या रवैया पुरानी ढर्राई चीजों पर तो चल जाता है, लेकिन किसी नई स्थिति में नहीं चल पाता। अचानक जब कोई नई परिस्थिति खड़ी होती है, तो वह रवैया हमें परेशान करता है। तब भी अगर हम नहीं समझते हैं, तो वह हमें पीछे की ओर ले जाता है। और जब हम लचीले होते हैं, तो नए हालात के लिए आराम से तैयार हो जाते हैं।

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