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संवाद की पहल

भारत और चीन के संबंधों में जटिलताएं और पेच निकट भविष्य में तो खत्म होते नहीं दिखते, लेकिन यह भी जरूरी है कि दोनों के रिश्तों में उलझनें एक हद से ज्यादा न बढ़ें। पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और चीनी प्रधानमंत्री वेन जिआबाओ की मुलाकात से इस दिशा में कुछ प्रगति हो सकती है।

चीनी प्रधानमंत्री इस दिसंबर में भारत आ रहे हैं और इस यात्रा को सार्थक बनाने के लिए दोनों देशों के बीच अविश्वास को कम करना जरूरी है। चीन और भारत पड़ोसी हैं और ‘ब्रिक’ जैसे गठबंधनों के सहयोगी भी हैं। पर्यावरण और विश्व व्यापार जैसे कई मुद्दों पर हमारे हित मिलते हैं और हम साथ में काम भी करते हैं, लेकिन यह भी सच है कि दोनों देश अर्थव्यवस्था और कई विदेशी मामलों, खासतौर पर पूर्वी एशिया और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में प्रभाव को लेकर प्रतिद्वंद्वी भी हैं।

चीन और भारत के बीच पुराना सीमा विवाद है और इसमें जब-तब तल्खी आती रहती है। भारत की समस्या खासतौर पर पाकिस्तान को लेकर है, जिसका इस्तेमाल चीन भारत को दबाव में रखने के लिए करता रहता है। इन विवादों की वजह से आर्थिक क्षेत्र में भी भारत और चीन उतना सहयोग नहीं कर पाते, जितना उन्हें करना चाहिए।

अगर चीन और भारत आर्थिक क्षेत्र में ज्यादा सहयोग कर सकें तो ये दोनों देश और दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य मित्र देश मिलकर इतना बड़ा गठबंधन बना सकते हैं कि वह किसी भी पश्चिमी आर्थिक ताकत को आसानी से चुनौती दे सके।

भारत की कोशिश इस क्षेत्र की विशाल आर्थिक संभावनाओं का ज्यादा से ज्यादा दोहन करने की है, क्योंकि ऐसी साझा कोशिश सारे देशों को तेजी से गरीबी और पिछड़ेपन से उबार सकती है। भारत-चीन के बीच अविश्वास और संदेह इस दिशा में आगे बढ़ने में बाधक है। आखिरकार काफी हद तक भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद भी चीनी सहारे पर ही टिका हुआ है।

चीन की भारत से आर्थिक प्रतिद्वंद्विता तो है ही, लेकिन चीन की समस्या भारतीय लोकतंत्र से भी है। आधुनिक चीन पिछले साठ वर्ष से ज्यादा वक्त से एकाधिकारवादी देश रहा है और अब उदार अर्थव्यवस्था के बाद उदार राजनैतिक व्यवस्था की ओर जाने की मुश्किलों में उलझा हुआ है।

प्रधानमंत्री वेन ही अभी उदार राजनैतिक व्यवस्था की वकालत करने के बाद अनुदार ताकतों की कड़ी आलोचना के शिकार हुए हैं। चीनियों को डर यह भी है कि भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक पड़ोसी से ज्यादा दोस्ती उनके देश में लोकतंत्र के पक्ष में हवा बना सकती है और उसके दबे-ढके असंतुलन और असंतोष को अभिव्यक्ति मिल सकती है।

चीन की दूसरी समस्या यह है कि उनकी एकाधिकारवादी आर्थिक ताकत के मुकाबले लोकतांत्रिक पश्चिमी देश या जापान जैसे पूर्वी देश भी भारत की ओर उम्मीद से देखते हैं। भारत की कोशिश यह है कि चीन के साथ संबंधों में ये बातें आड़े न आएं, लेकिन चीन की आशंकाएं अपनी जगह हैं। हालांकि यह भी देखना दिलचस्प होगा कि चीन में लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर चल रहे विवाद में वेन की स्थिति कितनी कमजोर या मजबूत होगी, लेकिन सब कुछ के बावजूद भारत यही चाहेगा कि चीन में जैसी भी हुकूमत रहे वह दोनों देशों के रिश्तों को लेकर सार्थक नजरिया अपनाए।

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