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माया महाठगनि हम जानी

आजकल प्राय: प्रवचनों में कहा जाता है ‘‘माया (लक्ष्मी), महाठगनि हम जानि।’’ प्रवचनो में लक्ष्मी की जितनी निन्दा की जाती है उतनी अन्यत्र कहीं और नही दिखती। लेकिन आश्चर्य यह है कि जो लोग भी इस धन-वैभव की खुले आम निन्दा करते है, उन्हें भी लक्ष्मी के बिना चैन नही मिलता।

कहा तो जाता है कि इस माया रूपी धन को त्यागो तभी तुम्हें सुख शांति और मोक्ष की प्राप्ति होगी। लेकिन जब उनसे पुछा जाता है कि इस धन वैभव को कहां त्यागूं तो वे सीधे कहते है कि इसे मुझे दे दो क्योंकि वे भी धन के बिना एक दिन नहीं रह सकते।

आजकल के इस अर्थप्रधान युग में धन अब ईश्वर की तरह महत्वपूर्ण होने लगा है। इसलिए धन की निन्दा करना आसान है, धन के बिना रहना मुश्किल काम है। अगर निन्दा करनी है तो धन की निन्दा उचित नही है। धन से उत्पन्न धनमद् और धन के विकारो की निन्दा की जानी चाहिए।

धन से उत्पन्न विष मनुष्य को मदान्ध बना देता है। मनुष्य अविवेकी हो जाता है और साथ ही पापाचार और दुराचार की तरफ बढ़ने लगता है। गरीब व्यक्ति कभी अत्याचार नही करता, कोई भिखारी किसी सड़क चलते राहगीर को धक्का नही मारता। किसी निर्बल असहाय और कमजोर व्यक्ति को दुसरा कमजोर व्यक्ति नही सताता। 

लेकिन एक धनपति और धन के मद से मदान्ध व्यक्ति समाज में विभिन्न प्रकार का उत्पात करते है। अनाचार और दुराचार करता है। इसलिए लक्ष्मी की निन्दा किसी के लिये भी उचित नही है। लक्ष्मी के विकारो से ग्रसित और मदान्ध व्यक्ति की निन्दा समाज में होती है। वैसे तो प्रवचनों में अनेक नीतिपरक बातें कही जाती है, लेकिन उन तमाम बातों को स्वयं प्रवचन देने वाला भी अपने जीवन में नही उतारता है।

कहते है ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’’। जो लोग प्रवचनों में लक्ष्मी की निन्दा करते है उन्हें भी लक्ष्मी उतनी प्यारी होती है जितनी गृहस्थो को। मन्दिरो में भी गृहस्थों की तरह लक्ष्मी पूजा का विधान है। पर अफसोस, आजकल समाज में दिवाली के नाम पर जो वैभव का प्रदर्शन होता है, वह सचमुच चिन्ताजनक है। इस वैभव प्रदर्शन में कहीं पूजा नही दिखती।

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