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रेलयात्रा का जोखिम

याद कीािए भारत-पाक विभाजन के दौर की वे तस्वीरें, जिनमें भारी संख्या में शरणार्थी ट्रेनों की छतों पर बैठ के आए थे। वह उस आपात्काल में जान बचाने की लोगों की मजबूरी भी थी। वैसे हालात अब नहीं हैं, लेकिन जान जोखिम में डालकर ट्रेन की छत पर सफर करने की लोगों की मजबूरी हम अभी भी खत्म नहीं कर पाए हैं। सोमवार को सरयू एक्सप्रेस में हुआ हादसा यही बताता है कि नफे-नुक्सान और आधुनिकता के तमाम दावों के बावजूद आम यात्रियों को सुरक्षा देना अभी भारतीय रेलवे की प्राथमिकता सूची में नहीं है। ट्रेन की छत से गिरकर जान गंवाने और घायल होने वाले ज्यादातर नौजवान थे। वे सेना में जवानों की सामूहिक भर्ती के लिए फैााबाद जा रहे थे। अत: उस दिन ट्रेन में असामान्य रूप से ज्यादा भीड़ रही होगी, तभी मजबूरी में लोगों को छत पर बैठना पड़ा। सेना या रक्षा बलों की सामूहिक भर्ती के दौरान हादसों का होना अब कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस सुझाव को हमेशा नजरंदाज किया गया है कि भर्ती एकसाथ इतने बड़े पैमाने पर नहीं की जानी चाहिए। अगर हो तो भर्तीस्थल तक लाने-ले जाने की माकूल व्यवस्था भी हो। जब राजनैतिक रैलियों के लिए ट्रेनें चलाई जा सकती हैं तो सेना की भर्ती के लिए क्यों नहीं? सामूहिक भर्ती की इन समस्याओं का अर्थ यह नहीं है कि रलवे अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है। रलवे का काम लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाना ही नहीं, उन्हें पूरी तरह सुरक्षित पहुंचाना भी है। टिकट लेकर यात्रा करने वालों के प्रति रलवे को यह न्यूनतम जिम्मेदारी तो निभानी ही होगी। इस समय रलवे मुनाफा कमा रहा है, लेकिन इसे लेकर वाहवाही बटोरने के साथ ही अगर वह इसका इस्तेमाल यात्रा को सुरक्षित बनाने के लिए भी कर तो ज्यादा बेहतर होगा। हालांकि सुरक्षित यात्रा का यह दायित्व किसी भी तरह मुनाफे से जुड़ा नहीं है। सुरक्षा टिकट खरीदने वाले हर यात्री का अधिकार है और यह अधिकार यात्रियों को हर हाल में मिलना ही चाहिए। भले ही रलवे मुनाफे में चल रहा हो या घाटे में, वह टिकट पर सबसिडी दे रहा हो या उस पर प्रीमियम वसूल रहा हो। यह दुर्घटना उस दिन हुई, जिस दिन रलमंत्री ने जापान की तरह भारत में भी बुलेट ट्रेन चलाने का बयान दिया है। बुलेट ट्रेन के चलने में कोई एतराज नहीं है, लेकिन जो रलवे अपने यात्रियों को मूलभूत सुरक्षा नहीं दे सकता, उसकी बुलेट ट्रेन की साख भी हमेशा संदेह के घेरे में ही रहेगी।

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