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सांसों का सुर

अपनी बोर्ड मीटिंग से लौटकर वह अनमने से थे। अपने केबिन में आने के बाद कहीं जाने का मन नहीं हो रहा था। किसी से बात करने की इच्छा भी नहीं थी। कोई आता भी तो उसे टाल देते थे। अचानक उन्होंने महसूस किया कि सांस लेने में काफी जोर लगाना पड़ रहा है।

‘हमारे मूड के हिसाब से सांसों का रुख भी बदल जाता है। कभी-कभी जब हम तनाव में होते हैं, तो सांस रुकी-रुकी सी महसूस होती है।’ यह कहना है यूटा यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. एलन फोजल का। उनका मानना है कि अगर हम अपनी सांसों पर ध्यान देकर ठीक कर लें, तो तनाव दूर कर सकते हैं। उसके लिए गहरे सांस लेना बेहद जरूरी है। गहरी सांस लेने की आदत डाल लें तो क्या कहने!

क्या आपने कभी अपनी सांसों की आवाजाही को महसूस किया है? हम कैसे सांस लेते हैं, उससे हमारी सेहत का अच्छा-खासा लेना-देना है। अपने यहां तो माना ही जाता है कि हमारे पास गिनी-चुनी सांसें ही होती हैं। अब सांस पर जो नियंत्रण कर लेता है, वही लंबे समय तक जीता है। इसीलिए हमें अपनी सांसों पर ध्यान देना जरूरी है। हमारे जीवन दर्शन में उसे प्राणवायु कहा जाता है और उसे साधने के लिए प्राणायाम बनाया गया। 

प्राणायाम पर अपने यहां बहुत जोर है। हमारी सेहत उस पर टिकी हुई है। प्राणायाम हमें स्वस्थ तो रखता ही है, फोकस करने में भी मदद देता है। हमें एकाग्र करने में उससे बेहतर कोई चीज नहीं मानी जाती। दरअसल, ध्यान करते हुए हमें सबसे पहले प्राण को ही साधना पड़ता है।

हमें अपने तमाम भटकावों को एक बिंदु पर लाना होता है। सांसों से ही हम एकाग्रता पर पहुंचते हैं। हमें अपनी सांसों पर जरूर ध्यान देना चाहिए। अपनी सांसों के सुरों को सुनना एक अनुभव है। आप भी उसका अनुभव कीजिए।

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