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कमजोरों के निर्वाचन अधिकार की गारंटी

पाकुड़ जिले के नरोत्तमपुर पंचायत की दुल्लर मुमरू मुखिया पद के लिए पर्चा दाखिल करना चाहती है। लेकिन दंबग किस्म के कुछ नेता नहीं चाहते कि वह चुनाव लड़े। दुल्लर के जाति प्रमाण पत्र बनाने में अड़ंगा डाला जा रहा है। उनके परिवार के सदस्यों पर अप्रत्यक्ष रुप से दबाव बनाया जा रहा है कि चुनाव में खड़ा होने से उसे मना किया जा सके।

कई लोगों की ओर से प्रलोभन भी दिये जा रहे हैं। वह असमंजस में है कि क्या करे, कहां शिकायत करें। कैसे अपनी सुरक्षा करें। यह कहानी अकेले दुल्लर मुमरू की नहीं है। विधानसभा, लोकसभा या स्थानीय निकायों के चुनाव में कमजोर प्रत्याशियों को दबाने, प्रताड़ित करने और उसे निर्वाचन और मतदान के अधिकार से वंचित करने का षड़यंत्र नई बात नहीं है।

कमजोर तथा वंचित समुदाय के प्रत्याशियों तथा मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा का दायित्व निर्वाचन पदाधिकारी और जिला प्रशासन का है। निर्वाचन अपराध की रोकथाम के लिए अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 की धारा-3 (1)(7) में विशेष प्रावधान किये गये हैं।

अधिनियम के तहत गैर आदिवासी या गैर दलितों द्वारा आदिवासियों तथा दलितों को निर्वाचन अधिकार से वंचित करने या बाधा डालने या प्रताड़ित करने की स्थिति में कार्रवाई का प्रावधान है। राज्य निर्वाचन आयोग ने ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारियों द्वारा अविलंब कार्रवाई करने तथा कार्रवाई की रिपोर्ट आयोग के समक्ष नियमित अपडेट करने का निर्देश दिया गया है।

ऐसे सभी मामलों के लिए निर्वाची पदाधिकारी के यहां शिकायत दर्ज की जा सकती है। दोषी पाये जाने पर दस माह से पांच वर्षो तक की सजा सुनाने का प्रावधान है। झारखंड पंचायत राज अधिनियम तथा भारतीय दंड संहिता में ऐसी कार्रवाइयां निर्वाचन अपराध की श्रेणी में आते हैं और इसके लिए दोषियों के खिलाफ कारावास तथा जुर्माने का प्रावधान है।

भारतीय दंड विधान के अनुरूप झारखंड पंचायत राज अधिनियम की धारा-154 में सक्षम प्राधिकार को ऐसे व्यक्तियों के निर्वाचन को रद्द करने और अयोग्य घोषित करने का अधिकार है। इसी प्रकार भारतीय दंड विधान की धारा 171 ए, बी और सी का वास्ता आम आदमी के निर्वाचन अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी से है।

निर्वाचन अधिकारों के तहत मत देने, निर्वाचन में खड़ा होने तथा नामांकन करने और नामांकन वापस लेने के अधिकार शामिल हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 171ए में मत देने के अधिकार से मतलब है, किसी व्यक्ति का किसी निर्वाचन में खड़ा होने या न होने या अभ्यार्थिता वापस लेने या न लेने या मत देने अथवा नहीं देने से संबंधित अधिकार धारा 171 बी तथा 171 सी के अधीन रिश्वत अथवा अनुचित प्रभाव के लिए एक वर्ष का कारावास तथा जुर्माना अथवा दोनों से दंडित किये जाने का प्रावधान है।

राज्य निर्वाचन आयोग का निर्देश है कि उम्मीदवारों को नामांकन पत्र देने से रोकने या नामांकन वापस लेने के उद्देश्य से प्रताड़ित करने या बल प्रयोग करने या रिश्वत या अनुचित प्रभाव डालने की शिकायत या सूचना निर्गमन पदाधिकारी को मिलती है तो उनके स्तर से पुलिस अधिकारियों को अविलंब मामले की जांच हेतु कहा जाना चाहिए।

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