DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अब कृत्रिम अंग प्राकृतिक की तरह ही होगा मजबूत

अब बनावटी अंगों के टूटने या अलग होने के असाध्य दर्द से मुक्ति मिल जाएगी। आईआईटी कानपुर के मैटलर्जी इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर कांतेश बालानी ने इंजीनियरिंग मेटल्स को प्राकृतिक अंगों की तरह मजबूत करने का फार्मूला खोज निकाला है। उन्होंने मिनरल तत्व और धातुओं का इस्तेमाल कर कृत्रिम हड्डी और अंगों को सत्तर गुना तक अधिक मजबूत कर दिया है। 14 नवंबर को बंगलूरू में लोहा एवं इस्पात मंत्रलय डाक्टर बालानी को यंग मेटलजिस्ट साइंटिस्ट पुरस्कार से सम्मानित करेगा। इसमें प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह समेत शीर्ष वैज्ञानिकों के भाग लेने की उम्मीद है।
  डाक्टर बालानी बताते हैं विभिन्न क्षेत्रों में मेटल्स के उपयोग को लेकर प्रयोग किए गए हैं। अध्ययन के बाद स्पष्ट हो गया है कि इंजीनियरिंग उत्पादों की क्षमता प्राकृतिक अंगों की तुलना में बेहद कम होती है। मुख्य रूप से हाइड्रो आक्सी हेपेटाइट ओर प्रोटान से तैयार कृत्रिम हड्डियां लगाने के बावजूद ज्यादा टिकाऊ नहीं होती हैं। इनके टूटने और अपनी जगह से हटने का खतरा लगातार बना रहता है। हालांकि इन दोनों तत्वों के साथ मिनरल पार्ट मिलाकर क्रत्रिम उपकरण को सुधारा जा सकता है। इससे उत्पाद की क्षमता 70 फीसद तक बढ़ जाती है। यानी लगातार प्राकृतिक अंगों की तर्ज पर काम लेने के बावजूद कृत्रिम अंग और हड्डियां जीवन भर हमराही बनी रहेंगी। खोज में डिपार्टमेंट आफ बॉयोटेक्नोलॉजी ने भी भूमिका निभाई है। 
प्रोफेसर बालानी ने 1999 में पीएसजी टेक्निकल इंस्टीटय़ूट से बीटेक किया। 2001 में आईआईटी मद्रास से एमटेक करने के बाद यूएसए की कैंटबर्ग यूनिवर्सिटी से 2002 में एमएस किया। फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी से 2007 में पीएचडी के बाद 2008 में आईआईटी कानपुर में सहायक प्रोफेसर के पद पर शोध एवं अध्यापन शुरू किया। अब वह विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे हैं।

माता हुईं भावुक, आईआईटी में खुशी की लहर
बालानी की सफलता पर आईआईटी में जश्न का माहौल है। निदेशक संजय जी धांडे और रजिस्ट्रार संजीव एस कशालकर समेत कई प्रोफेसरों ने उन्हें बधाई दी है। उनकी माता रजनी बालानी और पत्नी वंदना बालानी बेहद उत्साहित हैं। श्रीमती रजनी भावुक होकर कहती है कि माता-पिता के नाम से तो हमेशा ही बेटा जाना जाता है कि लेकिन जब बेटे की पहचान माता-पिता की पहचान होती है तो उससे अच्छा दिन और कोई भी नहीं हो सकता है। श्रीमती रजनी भी इस सफलता को गर्व की अनुभूति बताती है। डाक्टर बालानी अपनी सफलता का विशेष श्रेय पीएचडी गाइड डाक्टर अरविंद अग्रवाल को देते हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:अब कृत्रिम अंग प्राकृतिक की तरह ही होगा मजबूत