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सूचना के तीर से भेदा 21 साल पुराना तिलिस्म

लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया एक बार फिर सवालों से घिर गई है। फर्जी प्रमाण पत्र लगाकर आयोग से नौकरी हथियाने का एक और मामला बुधवार को सामने आया। इस बार फर्जी तरीके से नौकरी पाने वाले व्यक्ति का खुलासा 21 साल बाद सूचना के अधिकार के तहत माँगी गई जानकारी के आधार पर हुआ है।


भुसौली टोला खुल्लदाबाद निवासी राजन बाबू ने आरोप लगाया कि वर्ष 1985 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की पीसीएस परीक्षा में कृपा शंकर मिश्र नाम के अभ्यर्थी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पर आश्रित होने का फर्जी प्रमाण पत्र लगाकर डिप्टी एसपी की नौकरी हथिया ली थी। उन्होंने आरोप लगाया कि कृपा शंकर ने फर्जी तरीके से स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का आश्रित होने की सूचना दी थी, जबकि ऐसा नहीं था। इंटरव्यू के दौरान भी उनके पास प्रमाण पत्र नहीं था, लेकिन उन्होंने खरीदफरोख्त करके डीएम कार्यालय से फर्जी पत्र आयोग को भिजवा दिया। इस बारे में जब राजन ने शिकायत दर्ज कराई तो आयोग ने पहले उनकी बात नहीं मानी, लेकिन जब वे लगातार प्रयास करते रहे तो आयोग ने अन्तत: 1992 में उनकी बात मानी और कृपा शंकर का अभ्यर्थन निरस्त करने की संस्तुति की। राजन का कहना है कि कृपा शंकर के ठीक नीचे उनका नाम था। इसलिए वे लगातार मामले के पीछे लगे रहे। शासन ने आयोग की संस्तुति पर विचार नहीं किया। ऐसे में कृपा शंकर अपने पद पर बने रहे। इस बीच राजन भी असिस्टेंट लेबर कमिश्नर हो गए और आयोग ने उन्हें शिकायत करने के आरोप में निलंबित कर दिया। कोर्ट से राजन को जीत मिली और उन्होंने दोबारा कोशिश की और कृपा शंकर के मामले की जानकारी प्राप्त की। उन्हें पता चला कि कृपा शंकर अपने पद पर बने हुए हैं। मामले में कोई जानकारी न मिलने पर राजन ने वर्ष 2005 में सूचना के अधिकार के तहत पुन: जानकारी माँगी। जिस पर जाँच बैठी और 22 अप्रैल 2010 को शासन ने कृपा शंकर मिश्र के अभ्यर्थन को निरस्त किया है। इसकी जानकारी उन्हें बुधवार को ही हुई।

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