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विकास के तर्क और चुपका वोटर

एक बार फिर यह अहसास हुआ कि किसी का मन टोहना, वह भी चुनाव में, शायद सबसे मुश्किल काम है। बिहार में तो और। और इसलिए क्योंकि बिहार में राजनीतिक जागरूकता की चर्चा खूब होती है और आप चाहें तो मतदाता से खूब बतिया भी लीजिए।

परवेज मुशर्रफ से लेकर माइक्रो बैंकिंग तक की जानकारी आपको मिल जाएगी, लेकिन वह आसानी से यह नहीं बताएगा कि किसे वोट देगा। अच्छा-बुरा बता देगा, पर आखिरी दिन तक बोलेगा यही- हम देखेंगे, किसे देना है? पढ़े-लिखे, अमीर-गरीब, बैकवर्ड-फारवर्ड, दलित-महादलित, हिन्दू-मुसलमान किसी से पूछ लीजिए, मुंह नहीं खोलेगा। देहाती भाषा में इसे ‘चुपका वोट’ कहते हैं। लेकिन यही वोट बातों-बातों में मुखड़ा भी बता जाता है, दुविधा भी दिखा जाता है।

नेताओं और पार्टियों को भ्रम में रखना उसे खूब आ गया है और यही वजह है कि चाहे वो छोटा नेता हो या बड़ा, उसके कद के अनुसार, भीड़ दिख ही जाती है। नीतीश कुमार, लालू यादव, सोनिया गांधी, राहुल सब उस भ्रम में वोटों की गिनती तक जीत-हार और हवा में गणित अपने पक्ष में बताते रहते हैं। 1995 में जब लालू यादव की सभाएं होती थीं तो लगने लगा था कि वो आ रहे हैं। 2005 में ऐसी ही हवाएं नीतीश के पक्ष में दिखीं। पर इस बार सभाओं की भीड़ से बड़े नेता या उनके उम्मीदवार खूब खुश हो सकते हैं। सबकी सभाओं में अच्छी ही नहीं, शानदार भीड़ आ रही है।

पर जब आप मतदाताओं से चुनाव से जुड़ी बातचीत शुरू करेंगे तो वे जवाब कुछ अपने ढंग से देंगे। उसे अखबार वालों के सवालों का एहसास होता है। कैसा चल रहा है- अच्छा चल रहा है। लेकिन आखिरी में जब आप सीधे-सीधे पूछ लेते हैं कि किस आधार पर वोट देंगे या फिर किसे देंगे, तो वह किसे देंगे का जवाब तो टाल जाता है। किस आधार पर देंगे? इसका जवाब कभी-कभी दे देता है।

उसके जवाब में गुस्सा भी दिखता है, मजबूरी भी और निर्णय भी। कहता है, टिकट तो गलत आदमी को मिला, पर काम हुआ है, विकास हुआ है। सड़कें बनी हैं, लड़की को साइकिल मिली है। काम-धंधा ठीक हुआ है। लेकिन कोई कहता है कि वे हमारी जाति के हैं, लालटेन को वोट देंगे। तय तो कर लिया है पर रायशुमारी से ही बटन दबाएंगे, लेकिन 70 प्रतिशत लोगों के जवाब आपको उसकी राजनैतिक सहमति, उसका मन बता ही देंगे।

सोनपुर से लालू यादव की पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी लड़ रही हैं। दियारा में स्वजातियों से एक स्वर में ‘लालटेन पर गिरेगा’ सुनने को मिला। साथ ही वह सामने चल रहे प्राइमरी स्कूल में टीचर होने के बावजूद पढ़ाई नहीं होने के लिए नीचे के किसी पदाधिकारी को नहीं बल्कि सीधे नीतीश कुमार को जिम्मेदार बता देता है।

लेकिन यहीं से थोड़ा आगे परमानंदपुर में महादलित का दर्जा पा चुके नटों से बात कर लीजिए। फौरन शिकायतें। इंदिरा आवास बना है, पर अधूरा है। किरोसिन भी पूरा नहीं मिलता। पर वोट तो इसी सरकार को देंगे, इसने काम तो किया ही है। वहीं, बाजार में किराने की दुकान चलाने वाली कमला पहले तो चुप्पी साधे रहती है, फिर कहती है, दुकानें जब तक मर्जी होती है, खोले रहते हैं, आगे भी खुले, यही चाहते हैं हम। दुकानदारों का तो लक्ष्य तय सा लगता है। चाहे वो छपरा-पटना एनएच पर दुकानदार बिंदीलाल साह हो या फिर जनार्दन गुप्ता- इस बार जाति नहीं। सिर्फ काम और विकास।

यह चुनाव विकास- जाति का द्वंद्व साबित होगा। शायद ही बिहार के विधानसभा चुनाव में, किसी शब्द का इस्तेमाल इतना हुआ है, जितना इस बार विकास शब्द का हो रहा है। नीतीश की सभाओं में ये जुमले खूब उछलते हैं। एक-काम किया है, तो मजूरी मांग रहा हूं। दो- काम किया है, काम करेंगे। तीन- सफर के बीच नहीं बदलें ड्राइवर। चार- विरोधियों का विकास से परहेज, पर कर रहे विकास की बात।

लालू यादव भी अपनी शैली में तो वोट मांग ही रहे हैं, पर साथ ही कह रहे हैं, चमका देंगे बिहार को, इसबार मौका तो दीजिए यानी विकास पहली बार बिहार के चुनाव में केन्द्र में दिख रहा है। लोग बहस जरूर करते हैं कि विकास किसका हुआ, किसका नहीं। पर सच भी स्वीकारते हैं कि सड़कें बनी हैं, कानून-व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन दिख रहा है। भ्रष्टाचार की बात आते ही उनकी जुबान तल्ख हो जाती है।

चुनावी चर्चा में पांच साल बनाम पंद्रह साल का नारा भी खूब गूंज रहा है। इस पर बातें खूब हो रहीं हैं। कुछ जगह तो लगता है कि काम या उसकी आहट ही सब कुछ है। चम्पारण का एक छोटा ग्रामीण बाजार है राजापुर मठिया। वहां श्याम बाबू शुरुआती झिझक जब तोड़ते हैं, तो एक नन्हा वाक्य गढ़ देते हैं- ‘विकास’ की बिक्री से सत्ता हासिल की जा सकती है।

वहीं मो. अहमद को इस शब्द के आगे कोई और मुद्दा नहीं दिखता। अयोध्या का भी नहीं, लेकिन हम गलतफहमी में नहीं रहे कि बिहार में जाति खत्म हो चुकी है या फिर उसका असर नहीं दिखेगा। या सोशल इंजीनियरिंग का पुराना समीकरण ही काम करेगा। यह साफ-साफ टूटता दिख रहा है कि जाति तोड़क रसायन ढूंढ़ लिया गया है और उसके परम्यूटेशन-कंबीनेशन (संभावनाएं) तलाशे जा रहे हैं।

अगर सीवान में चर्चित शहाबुद्दीन के इलाके में हवा बदली दिखे, तो आपको ताज्जुब नहीं होना चाहिए। पढ़े-लिखे मकेश्वर या दिनेश मिश्र को साफ लगता है कि अगड़ों के अलावा ओबीसी में जाति के आधार पर वोट डालने की परंपरा टूट रही है, पर अगर बिन्दुसार गांव के पूर्व मुखिया हमीमुल्ला से बात करें तो वो उसकी वजह बदले हुए हालात बताते हैं। चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने वाले अल्पसंख्यक वर्ग कहां जाएंगे, इसका जवाब आसान नहीं दिखता। कुछ डंके की चोट पर फैसला सुनाते  हैं, कुछ राय की बात करते हैं और एक बड़ा तबका नेता विशेष पर विश्वास करता नजर आता है।

चुनाव में एक बड़ा बदलाव महिलाओं और युवाओं की हिस्सेदारी पर भी है। पंचायत से आगे बढ़ती महिलाओं ने कुछेक नेतानुमा अगड़े नेताओं को जरूर नाराज कर दिया, पर मतदान में दो चरणों में उनकी बढ़ी भागीदारी ने साबित कर ही दिया कि उनको सिर्फ पति की मोहर नहीं माना जा सकता। यह भी तय है कि इस दिशा में एक बड़ी मंजिल पाना अभी शेष है। यह चुनाव दबंगई को भी बड़ी चुनौती देने वाला साबित हो रहा है। डर को धता बता वोट डालने का क्रम अगड़ों का दर्प तोड़ता दिख रहा है।

लेखक हिंदुस्तान, पटना के कार्यकारी संपादक हैं

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