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हमारा सौभाग्य

कुछ लोगों का सौभाग्य होता है कि उन्हें वह नहीं मिलता, जो वे चाहते हैं और वह मिलता है, जो वे नहीं चाहते। अरुंधति राय को ही लें। वे सैयद अली शाह गिलानी के साथ बैठकर कश्मीर की आजादी की वकालत करती हैं और माओवादियों का भी समर्थन करती हैं।

वे भारतीय राष्ट्र-राज्य के दमनकारी और उत्पीड़क रूप की मुखालफत करती हैं, लेकिन उनका सौभाग्य यह है कि वे गिलानी के आजाद कश्मीर में या किसी माओवादी सरकार के राज में नहीं रहतीं। अगर वे गिलानी की इच्छा के कश्मीर में रहतीं तो उन्हें सिर से पैर तक बुर्के में खुद को ढंका रखना होता। उन्हें किसी न किसी मुद्दे पर जेल में डलवा दिया गया होता या फिर ऐसी कोई सजा मिल गई होती जिसकी तजवीज कट्टरपंथी संगठन करते हैं।

अगर वे किसी माओवादी स्वर्ग में रह रही होतीं तो राष्ट्रविरोधी हरकतों के आरोप में किसी अदालत में लगभग 10-15 मिनट उन पर मुकदमा चलता और उन्हें ऐसी कोई सजा मिल गई होती जो स्टालिन या माओ ने ‘राष्ट्रविरोधी लोगों’ के लिए तय कर रखी है।

भारत की सरकार देवदूतों से नहीं बनी है, लेकिन अरुंधति राय का यह भी सौभाग्य है कि वे इस देश में रहती हैं, जिसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेताओं ने अपनी कोशिशों से धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक बना ही दिया।

हमारे लोकतंत्र में ढेर सारे छेद हैं लेकिन इन छेदों की आलोचना करते-करते वे गहरे कट्टरपंथी कुओं और खाइयों का समर्थन करने लगती हैं। यह सिर्फ अरुंधति राय का ही नहीं हम जैसे गरीब कलम घिसने वालों का भी सौभाग्य है कि हम अरुंधति राय की स्वर्गोपम कल्पना के क्षेत्रों में नहीं रहते। फर्क सिर्फ यह है कि अपनी हजार कमियों के बावजूद अपने लोकतंत्र के प्रति हम कृतज्ञ हैं।

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