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तरक्की की तस्वीर

आर्थिक संपादकों के सम्मेलन में वित्त मंत्री ने बेलगाम महंगाई और विदेशी पूंजी के अतिरिक्त प्रवाह से उत्पन्न आशंकाओं को खारिज करते हुए अर्थव्यवस्था की तरक्की की अच्छी तस्वीर पेश की। उन्हें उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था की विकास दर पहले बताए गए 8.5 प्रतिशत के लक्ष्य को हासिल करेगी और संभव है कि वह कुछ समय के लिए 9 प्रतिशत भी पहुंच जाए।

वित्त मंत्री अर्थव्यवस्था को लेकर उस तरह से बिल्कुल आशंकित नहीं दिखे जिस तरह से रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर वाई.वी. रेड्डी जैसे अर्थशास्त्री दिखाई दे रहे हैं। रेड्डी जैसे नीतिकारों की चिंता का आधार यह है कि जिन देशों में महंगाई की दर काफी ऊंची है, वहां संस्थागत विदेशी निवेश तेजी से आ रहा है।

पिछले साल की इस अवधि के दौरान जितना निवेश आया था, उसके मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा आ चुका है। वर्ष 2009 में अक्टूबर तक 15.5 अरब डालर का निवेश आया था, तो इस साल यह 34.36 अरब डालर तक पहुंच चुका है। इससे एक आशंका डालर के मुकाबले रुपए के मूल्य बढ़ने और दूसरी आशंका देश में महंगाई बढ़ने की होती है।

यह अर्थव्यवस्था की ओवरहीटिंग के लक्षण हैं। इसी नाते यह सुझाव दिया जा रहा था कि विदेशी निवेश के अतिरिक्त आगमन पर कुछ अंकुश की जरूरत है। यह स्थिति भारत ही नहीं एशिया के अन्य देशों में भी है और उन्होंने अंकुश लगाए भी हैं। जैसे थाईलैंड ने सरकारी बांडों को दबाए बैठे विदेशियों पर 15 प्रतिशत टैक्स ठोक दिया है तो ताईवान, दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया ने कुछ नरम लेकिन पाबंदी वाले कदम उठाए हैं।

इन छोटे देशों के विपरीत भारत की विशाल अर्थव्यवस्था विदेशी पूंजी के आगमन से कतई भयभीत नहीं है। इसीलिए वित्तमंत्री का मानना है कि पूंजी का यह तीव्र प्रवाह तो हमारे चालू खाते के घाटे के खिलाफ एक तरह का बीमा है। लंबे समय में इससे वित्तीय घाटा भी कम ही होगा।
  
सार्वजनिक उपक्रमों के निवेश और टेलीकॉम स्पेक्ट्रम से मिले राजस्व से सरकार इतनी आश्वस्त है कि वह अर्थव्यवस्था को संरक्षणवाद और प्रतिबंध लगाने वाली नीतियों की तरफ बिल्कुल नहीं ले जाना चाहती। उसकी स्पष्ट सोच है कि उदारीकरण के रास्ते पर सोच-समझकर आगे बढ़ने से महंगाई कम होगी, रोजगार बढ़ेगा, वित्तीय घाटा घटेगा और शानदार विकास दर हासिल की जा सकेगा।

इसीलिए वित्त मंत्री यह उम्मीद भी जता रहे हैं कि अगले कुछ महीनों में महंगाई छह प्रतिशत तक ले आई जाएगी। हालांकि ऐसी उम्मीद सरकार पहले भी जता चुकी है और उसके मुताबिक परिणाम नहीं निकले हैं। यह उम्मीद अगर खरीफ की अच्छी फसल और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की बेहतर स्थिति के चलते की जा रही है, तो इस पर निराश होने की कोई वजह नहीं बनती।

अर्थव्यवस्था की मौजूदा ताकत सप्लाई साइड के बूते पर बन रही है। जरूरत डिमांड साइड को भी ठीक करने की है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का यह अवलोकन आर्थिक एकांगीपन की तरफ संकेत करता है। इसके बावजूद हमारी तरक्की की यह तस्वीर महज आंकड़ों का गुलाबी गुलदस्ता नहीं है, बल्कि इसमें रोजगार के मीठे फल भी आते दिख रहे हैं। अब जरूरत तरक्की के इस फायदे को मध्य वर्ग से नीचे वंचित वर्गो तक ले जाने की है।

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