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कश्मीर पर केंद्रीय समिति सभी पक्षों को विश्वास में लेगी

कश्मीर पर केंद्रीय समिति सभी पक्षों को विश्वास में लेगी

जम्मू-कश्मीर पर वार्ता प्रक्रिया को बढ़ाने के लिए छोटे-छोटे कदमों की वकालत करते हुए केंद्रीय वार्ताकारों ने बुधवार को कहा कि राज्य में सभी विचारों के लोगों से बातचीत करने के अतिरिक्त उनके पास देश में सभी पक्षों को विश्वास में लेने की एक बड़ी जिम्मेदारी है।

तीन सदस्यीय समिति का नेतृत्व कर रहे दिलीप पडगांवकर ने श्रीनगर में संवाददाताओं से खुली बातचीत में कहा कि यदि देश के राजनीतिक मत का नेतृत्व करने वाली संसद को विश्वास में नहीं लिया जाता तो प्रयास व्यर्थ हो जाएगा। हम जानते हैं कि यह एक बड़ा दायित्व है, लेकिन इसे किया जाना है। उन्होंने कहा कि समग्र और स्थाई समाधान ढूंढ़ने के प्रयास के तहत कश्मीर में समाज के विभिन्न तबकों के साथ चार दिवसीय बातचीत के दौरान वार्ताकारों को काफी मूल्यवान जानकारी मिली।

पडगांवकर ने कहा कि हमने कश्मीर पर राजनीतिक मतों को सुना और लोगों के सामने रोजाना आने वाली स्वतंत्र होकर न घूम पाने या बच्चों के लिए दूध न मिल पाने जैसी समस्याओं के बारे में भी जाना। उन्होंने कहा कि टीम के राज्य के पहले दौरे के बाद किसी को भी बड़े कदमों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए और हम वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए छोटे-छोटे कदम उठाएंगे। पडगांवकर ने कहा कि आज और कल जम्मू में इसी तरह की बातचीत करने के बाद समूह राज्य में स्थिति में सुधार के लिए केंद्र को सिफारिश करेगा।

पडगांवकर ने कहा कि तत्काल राजनीतिक बंदियों, पथराव करने वालों की रिहाई और कर्फ्यू हटाना शीर्ष प्राथमिकताओं में है। उन्होंने कहा कि उनका मत है कि घाटी में शांतिपूर्ण सभाओं और प्रदर्शनों को अनुमति दी जानी चाहिए। हम सुरक्षा एजेंसियों का मत भी सुनना चाहते हैं। यदि 12 युवक प्रदर्शन करना चाहते हैं तो धारा 144 (निषेधात्मक आदेश) नहीं लगाई जा सकती। भाजपा सांसद राम जेठमलानी की टिप्पणी की ओर इशारा करते हुए पडगांवकर ने कहा कि उनकी आलोचना करने वाली एक राजनीतिक पार्टी के एक वरिष्ठ नेता उनका समर्थन करने के लिए पार्टी लाइन से हट गए।

उन्होंने कहा कि तथ्य यह है कि संसद द्वारा पारित एक प्रस्ताव (जम्मू कश्मीर) के पाकिस्तानी कब्जे वाले हिस्से को वापस लेने के लिए पाकिस्तान को एक पार्टी बना देता है। अलगाववादियों द्वारा उनसे मिलने से इंकार किए जाने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि जब भी वे हमसे मिलने का फैसला करेंगे हम तैयार रहेंगे लेकिन आमंत्रण उनकी तरफ से आना चाहिए। पडगांवकर ने कहा कि हालांकि यदि वार्ताकार उनसे मिलने का फैसला करते हैं तो उन्हें अलगाववादियों की ओर से कश्मीर की आलीशान मेहमाननवाजी मिलने की पूरी उम्मीद है।

प्रोफेसर राधा कुमार ने कहा कि वार्ताकार जमीनी हकीकत को जानने के लिए राज्य के सभी जिलों का दौरा करेंगे। उन्होंने कहा कि जब हम जिलों की यात्रा करेंगे तो इस बारे में बेहतर ढंग से समझ पाएंगे कि क्या किसी खास स्थान पर सुरक्षाबलों की तैनाती और उनके बंकरों की जरूरत है। यह पूछे जाने पर कि यदि कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए वार्ताकारों का मत भारतीय संविधान से परे गया तो क्या होगा, कुमार ने कहा कि संविधान इतना सुंदर और उदार दस्तावेज है कि यह 100 से अधिक बार संशोधित हो चुका है। यदि इस पर आम सहमति बनती है तो दोबारा ऐसा क्यों नहीं हो सकता।
 
पडगांवकर ने कहा कि आदर्श रूप से कश्मीर मुद्दे का समाधान पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र सहित राज्य के सभी भागों के लोगों का स्वीकार्य होना चाहिए। वार्ताकारों ने पत्रकारों से आग्रह किया कि वे उन्हें बिना हस्तक्षेप कार्य करने दें। उन्होंने कहा कि कई बार हम लोगों से मिलने जाते हैं और मीडिया पहले से मौजूद होती है तो लोग अपनी सही इच्छा व्यक्त करने की बजाय कैमरों के लिए बोलना चाहते हैं। कुछ मामलों ने लोगों ने हमसे मुलाकात के मीडिया में आने से सुरक्षा संबंधित चिंता व्यक्त की।

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