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विकलांगों के लिए भी सुगम बनें संकेत भाषा अनुवादक

विकलांगों के लिए भी सुगम बनें संकेत भाषा अनुवादक

पहले बधिर बच्चों को मंदबुद्धि समझा जाता था, क्योंकि न सुन पाने के कारण वे अजीबोगरीब व्यवहार करते थे। प्रख्यात आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन को बचपन में ही स्कूल से पागल या सिरफिरा घोषित करके निकाल दिया गया था, क्योंकि वह दूसरों की बात सुन नहीं पाता था और चूंकि उसके उर्वर मस्तिष्क में लगातार प्रश्न उमड़ते रहते थे, इसलिए वह बहुत ज्यादा प्रश्न करता था, जिससे सभी परेशान हो जाते थे।

जब बधिरों की समस्या पर चिंतन प्रारंभ हुआ तो उनके लिए संकेतों की भाषा का आविष्कार हुआ। इसमें उंगलियों आदि की विभिन्न मुद्राओं के माध्यम से विभिन्न अक्षरों, शब्दों व भावों को व्यक्त किया जाता है।

बढ़ती आवश्यकता

हालांकि संकेतों की भाषा का आविष्कार बहुत पहले हो चुका था, पर प्रारंभ में इसका चलन कम था। धीरे-धीरे अन्य विकलांग व्यक्तियों के साथ-साथ बधिर वर्ग में भी शिक्षा का तेजी से संचार हुआ और शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके अंदर अन्य प्रकार की जिज्ञासाएं और आवश्यकताएं भी पनपने लगीं और ऐसे लोगों की आवश्यकता महसूस होने लगी, जो संकेतों की भाषा में पारंगत हों और इस प्रकार वे विभिन्न प्रकार की सेवाएं बधिर वर्ग तक पहुंचा सकें।

संकेतों की भाषा दो प्रकार के लोगों के लिए आवश्यक होती है। ये हैं :

शिक्षकों व सहायकों के लिए

जो लोग बधिर लोगों को शिक्षा, आवश्यक जानकारियां देते हैं या विभिन्न प्रकार की सहायता करते हैं, उनके लिए संकेतों की भाषा सीखना अनिवार्य होता है। ये लोग लड़के-लड़कियों को सामान्य या व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराते हैं। इसके अतिरिक्त अनेक स्थानों जैसे अस्पतालों, संग्रहालयों, थियेटरों आदि में भी ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है, जो कि संकेतों की भाषा के माध्यम से बधिर लोगों को आवश्यक जानकारियां दे सकते हैं। अनेक मामलों में न्यायालयों में इस प्रकार के विशेषज्ञों की आवश्यकता पड़ती है। अनेक सरकारी एजेंसियां इस प्रकार के दुभाषियों को नियमित सेवा या विशेष अवसरों पर सेवा के लिए रखती हैं। विकलांगता या इससे संबंधित विषयों पर सेमिनारों या अन्य समारोहों में इस प्रकार के विशेषज्ञों की आवश्यकता अनिवार्य रूप से पड़ती है।

विशेषज्ञों के लिए

अनेक प्रोफेशनलों को विकलांगों, विशेष रूप से श्रवणहीनों के साथ कार्य करना होता है। उदाहरण के तौर पर अनेक विशेषज्ञताओं वाले विशेषज्ञों/चिकित्सकों को श्रवणहीन का उपचार करना पड़ता है। यदि वे अंशकालिक रूप से सांकेतिक भाषा सीख लें तो उन्हें न केवल कार्य करने में सुविधा होगी वरन् वे अपनी सेवा की गुणवत्ता में भी अच्छी-खासी वृद्धि कर सकेंगे। स्पीच थैरेपिस्ट, ऑडियो लॉजिस्ट, ऑक्युपेशनल थैरेपिस्ट, फिजियोथैरेपिस्टों के लिए संकेतों की भाषा सीखना लाभदायक होता है।
उपरोक्त के अतिरिक्त मनोविज्ञानियों को यदि श्रवणहीन व्यक्ति का उपचार करना हो तो उन्हें उनके साथ काफी समय बिताना पड़ता है और उनके मन की बात न केवल जाननी होती है, वरन मन में दबी ग्रंथि (गांठ) खोलनी होती है। हालांकि इस कार्य में वे परिवारजनों का सहयोग लेते हैं, पर कई बार या तो यह पर्याप्त नहीं होता या परिवारजनों के कारण ही मनोवैज्ञानिक समस्या होती है। ऐसे में यदि मनोवैज्ञानिक संकेत की भाषा में कुशल हों तो उचित इलाज न केवल संभव होता है, बल्कि और अधिक प्रभावकारी हो जाता है।

इसी प्रकार दर्शनीय स्थलों पर टूरिस्ट गाइड के रूप में कार्य करने वालों के लिए भी संकेतों की भाषा एक अतिरिक्त योग्यता के रूप में काम आती है। वे श्रवणहीन पर्यटकों को अतिरिक्त सेवा दे सकते हैं और इसके लिए अतिरिक्त आय भी प्राप्त हो सकती है। आजकल विकलांगों के लिए अधिकार आधारित सेवाएं प्रारंभ हो रही हैं और नियमों, कानूनों व दिशा-निर्देशों के अनुसार यह अनिवार्य हो गया है कि किसी भी व्यक्ति को मात्र विकलांगता के कारण किसी सेवा या सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता। इस कारण भी संकेतों की भाषा के विशेषज्ञों की मांग और बढ़ी है।

पाठय़क्रम

इस क्षेत्र में अनेक अल्पकालिक व पूर्णकालिक पाठय़क्रम उपलब्ध हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के समान अवसर प्रकोष्ठ के अल्पकालिक पाठय़क्रम चलाए जाते हैं। एक पाठय़क्रम प्रारंभकर्ता के लिए है, जो एक स्तर का पाठय़क्रम कहलाता है। दूसरे स्तर का पाठय़क्रम बारहवीं पास बच्चों के लिए ही है। चार सप्ताह का यह पाठय़क्रम सर्टिफिकेट स्तर का है। उपरोक्त के अतिरिक्त इंदिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर का पाठय़क्रम भी उपलब्ध है। इसकी जानकारी इग्नू की वेबसाइट से प्राप्त की सकती है।

आय के साधन

सांकेतिक भाषा विशेषज्ञों की भारत में बहुत मांग है। हालांकि यह मूलत: सेवा कार्य है, पर इसमें आय की संभावनाएं भी कम नहीं है। इस विषय का अध्ययन करने के पश्चात् शिक्षक के रूप में कार्य करने पर सामान्य शिक्षक का वेतनमान भी मिल सकता है। इसके अतिरिक्त अल्पकालिक रूप से भी इस कार्य को किया जा सकता है। इससे अतिरिक्त आय हो सकती है। बधिर बच्चों को टय़ूशन पढ़ाने से लेकर अनेक प्रकार के कार्य किये जा सकते हैं। भविष्य में इस विषय के विशेषज्ञों की मांग और बढ़ेगी, क्योंकि अब बधिर लोग अनिवार्य रूप से इस भाषा का अभ्यास कर रहे हैं।

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