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पूरब से रोशनी

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश नीति में से पूर्व के देशों का विशेष महत्व रहा है। हालांकि परंपरागत पश्चिम केन्द्रित विदेश नीति में सुधार की जरूरत शीत युद्ध के तुरंत बाद पी. वी. नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व के दौरान ही महसूस की गई थी लेकिन मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इस पर खास जोर दिया गया है।

प्रधानमंत्री की ताजा जापान यात्रा इस नीति में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। जापान और भारत के संबंध आम तौर पर दोस्ताना रहे हैं लेकिन इन संबंधों में काफी वक्त तक कोई खास गर्माहट नहीं थी। जापान एक विकसित देश था जिसका ज्यादातर लेनदेन पश्चिम के दूसरे विकसित देशों से था और भारत के लिए भी शीतयुद्ध के शक्ति संतुलन के नजरिए से जापान की कोई खास जगह नहीं थी।

जापान दुनिया का अकेला देश है जिसने परमाणु हमले झेले हैं, इसलिए परमाणु अप्रसार को लेकर जापान का नजरिया बहुत सख्त है। ऐसे में पोखरण-2 के बाद भारत-जापान संबंधों में ज्यादा ठंडापन आ गया था। लेकिन पिछले वर्षो में यह स्थिति बदली है।

भारत ने भी पूर्व के अपने मित्रों पर ज्यादा ध्यान दिया है और जापान को भी दुनिया के तमाम देशों की तरह यह समझ में आया है कि नई वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत की उपेक्षा नहीं की जा सकती। भारत की परमाणु नीति के बारे में भी जापान ज्यादा आश्वस्त हुआ है और इसकी वजह से दोनों देशों में परमाणु सहयोग की दिशा में भी पहल हुई है।

जापान के इस रवैये के पीछे भारत की आर्थिक ताकत तो है, भारत का लोकतंत्र और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का सिद्धांत भी उपयोगी साबित हुआ। भारत और जापान को परस्पर सहयोग की जरूरत चीन की वजह से भी है। चीन न सिर्फ एक विशाल आर्थिक ताकत बन कर उभरा है बल्कि उसकी राजनैतिक और सामरिक महत्वाकांक्षाएं भी साफ हैं। चीन की दक्षिण पूर्व एशिया में बढ़ती ताकत से संतुलन बिठाने के लिए दोनों देशों में हर क्षेत्र में भारी तालमेल चाहिए।
  
भारत एक उभरती हुई आर्थिक ताकत है, अपने आकार प्रकार में एक विशाल और भारी जनसंख्या वाला देश है, और सबसे बड़ी बात यह है कि लोकतांत्रिक मूल्यों और विश्वशांति के प्रति  भारत की प्रतिबद्धता है। उसका शक्तिशाली होना लोकतांत्रिक समाजों के लिए बेहतर है।

चीन अपने आर्थिक साम्राज्य का लाभ जहां जापान जैसे देशों के व्यापार को नुकसान पहुंचाने के लिए कर सकता है वहां भी भारत उनके लिए मददगार हो सकता है। भारत और जापान के साझा आर्थिक बयान में दुर्लभ धातुओं और मृदा के क्षेत्र में सहयोग ऐसे ही एक क्षेत्र की ओर इशारा करता है जहां चीन ने इन चीजों का जापान को निर्यात रोक कर ‘आर्थिक युद्ध’ की शुरुआत कर दी है।

भारत-जापान की बातचीत में भी चीन एक मुख्य विषय रहा है और अगले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से बातचीत में भी रहेगा। अच्छी बात यह है कि दक्षिण पूर्व में भारत का सहयोग बढ़ा है। यह आर्थिक रूप से भी अच्छा है और दूसरे क्षेत्र में सहयोग की दृष्टि से भी।

जापान के साथ संबंधों की रचनात्मक संभावनाएं उजागर होनी अभी शुरू हुई है और अगले पांच-दस साल में हो सकता है कि जापान हमारा बहुत अभिन्न मित्र और भागीदार बन कर उभरे। इस यात्रा की कई उपलब्धियां हैं लेकिन फिर भी यह सिर्फ शुरुआत ही है, इसके विस्तार की संभावनाएं विराट हैं।

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