DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पॉलीथिन पर रोक लगे

कानून बना देना काफी नहीं है, कानून का पालन करवाना भी सरकार की जिम्मेदारी है। पिछले दिनों पॉलीथिन पर रोक लगा दी गयी थी। कुछ समय तक शहर में पॉलीथिन का प्रयोग बंद रहा, परन्तु प्रशासन का उदारीकरण रुख देखकर व्यापारियों तथा आम जनता ने पॉलीथिन का प्रयोग शुरू कर दिया। ये जगजाहिर है कि पॉलीथिन हमारे पर्यावरण तथा धरती को नुकसान पहुंचाती है। इसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ता है। तमाम प्रकार की प्राकृतिक आपदायें समय-समय पर अपना रौद्र रूप दिखाती रहती है। इन सभी के पीछे मानव का ही हाथ है। अत: भीषण नुकसान पहुंचाने वाली पॉलीथिन पर लगी रोक का कड़ाई के साथ प्रशासन पालन करवाये।
संदीप जायसवाल, हरिद्वार

बेबुनियाद दलीलें
आए दिनों स्वयं को बुद्धिजीवी वर्ग की श्रेणी में रखने वालों की संवेदनशीलता में व्यापक परिवर्तन देखने को मिला है। कभी ये नक्सलवादियों के हितैषी बनकर उभर रहे हैं, तो कभी कश्मीर के अलगाववादियों की मांगों का समर्थन कर रहे हैं। इन बुद्धिजीवियों की अगुवाई अरुन्धति राय कर रही हैं, जो कभी माओवादी नीतियों का पक्ष ले रही हैं, तो कभी हुर्रियत काफ्रेंस के अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी के साथ कश्मीर की आजादी की मांग कर रही हैं। नई दिल्ली में एक काफ्रेंस में अरुन्धति राय ने बयान दिया कि भारत को कश्मीर से आजादी की जरूरत है। यह बयान उन्होंने किस आधार पर दिया यह समझ से परे है। साहित्यिक समझ को जटिल राजनैतिक मुद्दों को सुलझाने हेतु प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। देश के समक्ष कई जटिल समस्याएं हैं जैसे गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार आदि। परन्तु इस विशेष वर्ग की बौद्धिकता राष्ट्र विरोधी तत्वों का समर्थन करने तक में सीमित हो चुकी है। संविधान में प्रदत्त वाक स्वतंत्रता का प्रयोग राष्ट्र की अखण्डता को भंग करने के लिए नहीं किया जा सकता। केन्द्र सरकार द्वारा इस मसले को नजरअंदाज किया जाना भी खेदजनक है।
सोनाली राना, देहरादून

अस्पताल का हाल
प्रदेश के गढ़वाल मंडल के सभी जनपदों और दूर-दराज के पिछड़े क्षेत्रों के लिये शल्य चिकित्सा सहित तमाम गंभीर बीमारियों के निदान के लिये श्रीनगर बेस चिकित्सालय ही एक मात्र साधन संपन्न चिकित्सालय है। जिसे अब मेडिकल कॉलेज का भी दर्जा मिल चुका है। यहां देशभर की छात्र-छात्रएं डॉक्टरी शिक्षा ग्रहण कर रहे है। परन्तु इतने बड़े संस्थान में व्याप्त अव्यवस्थाओं को देखकर बड़ा खेद होता है। यहां पर न तो शौचालयों में निकासी की व्यवस्था और न ही परिसर में जमा कचरे को निस्तारित करने हेतु कोई निश्चित जगह। चिकित्सालय में प्रयोग होने वाले सामान के ढेर अस्पताल परिसर में तथा दायें-बायें जमा रहने के कारण लगता है जैसे किसी बड़े शहर की नगर पालिका का कचराघर हो। आये दिन डॉक्टरों, नर्सो और फार्मासिस्टों की हड़ताल इन सब अव्यवस्थाओं में आग में घी का काम कर रही है। महीनों तक मरीज ऑपरेशन के लिए भटकते रहते हैं। गरीब-पिछड़ी, अनपढ़ जनता जाये तो जाये कहां? क्या राजनेता मिशन 2012 से हटकर कुछ करेंगे।
डॉ. गुलाब सिंह राणा, रुद्रप्रयाग

शिक्षकों का स्तर
किसी भी राष्ट्र के निर्माण में शिक्षकों का बहुत बड़ा योगदान होता है। किन्तु आज अधिकांश शिक्षक केवल अपने विकास पर ध्यान देते हैं। उन्हें बच्चों के भविष्य से कोई सरोकार नहीं है, उनका ध्यान सिर्फ ट्यूशन पर रहता है। दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित विद्यालयों में तैनात शिक्षकों के तो दर्शन भी कम ही होते हैं। इसके अलावा राजनीति में ये पूर्ण रूप से सक्रिय रहते हैं तथा शेष समय में अपना स्थानान्तरण शहरों की तरफ करवाने में लगे रहते हैं। और तो और छात्राओं के साथ अश्लील हरकते करते हुए भी कई शिक्षक पकड़ में आ चुके हैं। ऐसे शिक्षकों से क्या उम्मीद की जा सकती है। ऐसे में लोग अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने के लिए विवश हैं। कोई भी समाज तभी शिक्षित हो सकता है, जब वहां के शिक्षक अच्छे हों। यदि शिक्षक चाहें तो विद्यालयों में पढ़ाई का ऐसा महौल बना सकते हैं कि प्रत्येक बच्चा सरकारी विद्यालय में ही पढ़ना चाहेगा। किन्तु ऐसा नहीं है, सरकार ने भी आनन-फानन में इनके वेतन में भारी बढ़ोत्तरी कर दी, लेकिन इनके अध्यापन कार्य के मूल्यांकन का आधार ही नहीं बनाया। इस नवसृजित प्रदेश में तो शिक्षकों को और भी मेहनत एवं समर्पण भाव से अपना काम करना चाहिए।
जी सी बमोला, देहरादून

प्रगति के लिए है जरूरी
मानव ही ऐसा प्राणी है जो स्वाभिमान के कारण अपना सिर सीधा रख सकता है। हमें सदैव ऐसे काम करने चाहिए जिससे हमार सिर ऊंचा रहे। स्वावलम्बी एवं स्वाभिमानी व्यक्ति सदैव अपने आप पर भरोसा करते हैं, अपने अभावों के लिए वे भाग्य अथवा भगवान को दोषी नहीं ठहराते, बल्कि रास्ता स्वयं बनाते हैं। आज के युग का आरक्षण, संरक्षण विशेषाधिकार पर बहुत जोर है, फलत: हर व्यक्ति कन्सेशन, कृपा, सहायता आदि का मुखापेक्षी बन गया है, वह स्वावलम्बी नहीं हो सकता। स्वाभिमान की रक्षा के मार्ग में बहुत कष्ट व श्रमसाध्य है, मार्ग में कांटें बिछे होते हैं। स्वाभिमानी व्यक्ति आत्म सम्मान की रक्षा के लिये बड़ा से बड़ा कष्ट उठाने को तैयार रहता है।
कालिका प्रसाद सेमवाल, रुद्रप्रयाग

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:पॉलीथिन पर रोक लगे