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पहले एशियाड में ही हाफ सेंचुरी जमाई थी भारत ने

पहले एशियाड में ही हाफ सेंचुरी जमाई थी भारत ने

अपने जमाने के मशहूर फर्राटा धावक लेवी पिंटो और गोताखोर केपी ठक्कर की अगुवाई में भारत ने 1951 में नई दिल्ली में हुए पहले एशियाई खेलों में ही अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करके पदकों का अर्धशतक पूरा कर दिया था।

भारत ने अपनी सरजमीं पर हुए इन एशियाई खेलों में 15 स्वर्ण, 16 रजत और 20 कांस्य पदक सहित कुल 51 पदक हासिल किए थे और वह जापान (24 स्वर्ण सहित 60 पदक) के बाद दूसरे स्थान पर रहा था। भारत ने इसके बाद तीन अवसरों (1962, 1982 और 2006 एशियाई खेल) में भी 50 से अधिक पदक जीते लेकिन वह कभी 15 स्वर्ण पदक का आंकड़ा नहीं छू पाया।

भारत को 1949 में पहले एशियाई खेलों की मेजबानी सौंपी गई थी जिन्हें 1950 में आयोजित किया जाना था लेकिन तैयारियों में देरी के कारण इन खेलों का आयोजन चार से 11 मार्च 1951 को हो पाया था। इन खेलों में 11 देशों के 489 खिलाड़ियों ने छह खेलों की 57 स्पर्धाओं में भाग लिया था।

मेजबान भारत ने लगभग सभी खेलों में हिस्सा लिया लेकिन एथलेटिक्स में उसने बेहतरीन प्रदर्शन किया जिसमें उसने दस स्वर्ण सहित 34 पदक हासिल किए थे। तब भारत के लेवी पिंटो ने 100 मीटर की दौड़ 10.8 सेकेंड में पूरी करके एशिया के सबसे तेज धावक बने थे। उन्होंने इसके अलावा 200 मीटर में भी स्वर्ण पदक जीता था जिसमें दूसरे नंबर पर भारत के ही एम गैब्रियल रहे थे।

पिंटो के अलावा पहले एशियाई खेलों में दो स्वर्ण पदक गोताखोर के पी ठक्कर ने जीते थे। उन्होंने तीन मीटर स्प्रिंग बोर्ड में पहला जबकि आशु दत्त ने दूसरा स्थान हासिल किया था। ठक्कर ने दस मीटर प्लेटफार्म में भी सोने का तमगा जीता था जबकि भारत के ही टीटी डांड तीसरे स्थान पर रहे थे। गोताखोरी में भारत का यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है क्योंकि इसके बाद वह इस खेल में केवल एक पदक जीत पाया और यह कांस्य पदक उसे 1954 में ठक्कर ने ही दिलाया था।

भारत ने एथलेटिक्स में जापान की कड़ी चुनौती का डटकर जवाब दिया। छोटा सिंह ने दो घंटे 42 मिनट 59 सेकेंड में मैराथन पूरी करके दिल्लीवासियों को अपना दीवाना बनाया तो रणजीत सिंह ने 800 मीटर और निक्का सिंह ने 1500 मीटर दौड़ जीती।

इनके अलावा मदन लाल (गोला फेंक), माखन सिंह (चक्का फेंक) और बख्तावर सिंह (दस किमी पैदल चाल) ने भी भारत को स्वर्ण पदक दिलाए। भारत की पुरुषों की चार गुणा 400 मीटर रिले टीम भी सोने का तमगा हासिल करने में सफल रही। महिला एथलीटों ने भी दो रजत और चार कांस्य पदक जीते।

तरणताल में सचिन नाग का जलवा देखने को मिला। उन्होंने पुरुषों की 100 मीटर फ्री-स्टाइल तैराकी एक मिनट 04.7 सेकेंड में पूरी करके एशिया के सबसे तेज तैराक होने का गौरव हासिल किया था। सचिन को तब देश का सर्वश्रेष्ठ वाटरपोलो खिलाड़ी माना जाता था और तीन साल पहले लंदन ओलंपिक में चिली के खिलाफ 7-4 से जीत में उन्होंने चार गोल किए थे।

सचिन को लेकिन आश्चर्यजनक रूप से एशियाई खेलों की गोतोखोरी टीम में नहीं लिया गया हालांकि इसके बावजूद भी भारतीय टीम सिंगापुर को 6-4 से हराकर स्वर्ण पदक जीतने में सफल रही थी।

सचिन की अगुवाई में भारत ने तीन गुणा 300 मीटर मेडले रिले और चार गुणा 100 मीटर फ्रीस्टाइल रिले का कांस्य पदक जीता था। इसके अलावा कांति शाह ने 100 मीटर बैकस्ट्रोक में रजत पदक जबकि जे नागिमवाला 200 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में कांस्य पदक हासिल किया था। तब सिंगापुर ने तैराकी में चार स्वर्ण सहित छह जबकि फिलीपीन्स ने तीन स्वर्ण सहित 13 पदक जीते थे। भारतीय फुटबाल टीम ने भी पहले एशियाई खेलों में अपना जलवा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी तथा बिना गोल खाए सोने का तमगा हासिल किया था। उसने पहले मैच में इंडोनेशिया को 3-0 से हराने के बाद अफगानिस्तान को भी इसी अंतर से मात दी और फिर फाइनल में ईरान को 1-0 से हराया था। फुटबाल में तब छह टीमों ने भाग लिया था।

पहले एशियाई खेलों में राष्ट्रीय स्टेडियम मुख्य स्टेडियम था जिसे आज ध्यानचंद स्टेडियम के नाम से जाना जाता है। इसमें भाग लेने वाले 11 में से आठ देश पदक जीतने में सफल रहे थे जबकि थाईलैंड, नेपाल और अफगानिस्तान खाली हाथ स्वदेश लौटे थे। कोरिया युद्ध के कारण तब कोरियाई देशों ने इसमें हिस्सा नहीं लिया था।

 

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