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प्रेशर डालो-पैसा लूटो का हुआ खेल

वें राष्ट्रीय खेल समय पर तो नहीं हो पाये, लेकिन खेल के नाम पर खेला जरूर हो गया। खिलाड़ी की भूमिका निभायी निर्माण कार्य में लगी एजेंसियों के अधिकारियों ने। खेल था- प्रेशर डालो और पैसा लूटो। इसमें करोड़ों की बाजी लगी। इस खेल में साथ दिया खेल संघों ने। जब सरकार और एजेंसी के बीच करार हुआ था, तो मेटेरियल कैरा का रट 8 से 10 किलोमीटर दूरी तय किया गया था। लेकिन एजेंसियों ने प्रेशर डालकर 20 से 22 किलोमीटर दूरी का कैरज रट ले लिया। पेंट मंगाने के लिए 400 किलोमीटर दूरी का कैरा रट लिया। इसमें एजेंसियों को करोड़ों का फायदा हुआ। एक्स्ट्रा आइटम के नाम पर सरकार से करोड़ों की रकम ली और पेपर पर अपना घाटा दिखाया। स्टील, बीम , गिट्टी, बालू हर चीज पर मुनाफा कमाया। सरकार निर्माण कार्य में तेजी लाने के लिए मैनपावर बढ़ाने का आग्रह करती रही, लेकिन एजेंसियों ने मैनपावर नहीं बढ़ाया। एक एजेंसी ने पेपर पर 2300 मैनपावर दिखाकर पैसे ऐंठ लिये। अभी भी यह सिलसिला जारी है। खेल संघों के अधिकारियों ने भी एजेंसी का भरपूर साथ दिया।ड्ढr हर सप्ताह डिााइन चेंज होता रहा। एक्िवटिक स्टेडियम में तो रिकॉर्ड परिवर्तन किये गये। कभी संघों को टाइल्स का रंग पसंद नहीं आया, तो कभी खिड़की पर लगे ग्लास पर गोदरा का लॉक लगाने की बात कही। इससे भी नहीं हुआ तो कांच की कंपनी ही चेंज करवा दी। एजेंसी भी खुश। करार के अनुसार एजेंसी ने इटालियन कंपनी का डाइविंग बोर्ड लगाया तो संघ के अधिकारियों ने इसे बदलकर इंडियन कंपनी डय़ूरा का डाइविंग बोर्ड लगाने का फरमान सुना दिया। यही नहीं कई जगहों पर बने- बनाये स्ट्रक्चर को बार-बार तुड़वाया। डिााइन में कई बार फेर-बदल हुआ। खेल संघों ने मीटिंग-सीटिंग के नाम पर लाखों खर्च किये।ड्ढr कभी जिमखाना में तो कभी रांची क्लब में हाइ-फाइ मीटिंग चली। विशेषज्ञों से विचार-विमर्श करने के नाम पर पानी की तरह पैसे बहाये गये। फिर भी नतीजा सिफर रहा।

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