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उर्दू मीडिया : जातिवाद पर हावी विकास

पहली बार बिहार में जात-पांत और संप्रदायवाद से ऊपर उठकर विधानसभा चुनाव विकास के मुद्दों पर लड़ा जा रहा है। सभी पार्टियों की इसको लेकर अपनी दलीलें हैं। कोई दोबारा मौका मिलते ही इस पिछड़े राज्य को विकास की बुलंदियां देने का आश्वासन दे रहा है तो कोई दूसरों के दावों को हवाई बताकर खुद को असली मसीहा साबित करने की जुगत में है।

चुनाव के बाद कौन-सा दल सत्ता संभालेगा और जीतने वाले पाटलिपुत्र की सरजमीं पर विकास का हल किस तरह चलाएंगे ये तो भविष्य की बातें हैं, पर उर्दू मीडिया को लगता है- चुनाव से पहले और नतीजे आने के बाद चलने वाला पाला बदल का खेल बिहार को और पीछे धकेल सकता है। इस मामले में सूबे के लोगों का अनुभव निहायत कड़वा है। जोड़-तोड़ से सत्ता की डोर थाम लेने वाले बाद में सरकार बचाने में अपना पूरा कार्यकाल बिता देते हैं।

विकास का मुददा उनकी प्राथमिकता की सूची में सबसे आखिरी हो जाता है। उर्दू अखबारों पर यकीन करें तो- जब तक बिहार के सियासतदानों के पाला बदल चरित्र में बदलाव नहीं आता, इस राज्य का भला होना संभव नहीं है। कुर्सी की सियासत से पहले दलों को अपने तमाम राजनीतिक एजेंडे में बिहार के उत्थान को सबसे ऊपर रखना होगा।

अखबार कहते हैं- गर्दिश के दिनों में लालू-राबड़ी सरकार का साथ देने वाली कांग्रेस के विजयरथ के सामने इस बार राष्ट्रीय जनता दल सीना ताने खड़ा है, जबकि पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लालू प्रसाद को बैठाने वाले नीतीश इस वक्त उन्हें अपना सबसे बड़ा सियासी दुश्मन मानते हैं। कुछ यही हाल लालू-रामविलास पासवान का है। लोकसभा चुनाव से पहले तक दोनों एक-दूसरे को एकदम नहीं सुहाते थे।

हैदराबाद का ‘मुंसिफ’ अफसोस जताता है- बिहार की बदकिस्मती है यहां के सियासी कैरेक्टर में बारबार आने वाला बदलाव। यह सिलसिला किसी तरह थमे तो प्रगति का पहिया आगे बढ़े। चुनावी गतिविधियां शुरू हुईं, तो लालू के दूसरे साले उनका साथ छोड़ गए। बार-बार राबड़ी देवी के ताने का शिकार बनने वाले ललन सिंह अब नीतीश विरोधियों में शामिल हैं। कल तक उन्हें नीतीश का परचम उठाए घूमते देखा गया। कुछ अखबारों को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी में काफी संभावनाएं नजर आ रही हैं।

एक अखबार के सीनियर जर्नलिस्ट साजिद रशीद कांग्रेस प्रवक्ता मोहन प्रकाश के हवाले से कहते हैं- इस युवा तुर्क में जवाहरलाल नेहरू और डॉ. अब्दुल कलाम-सी सादगी और युवाओं को अपनी ओर खींचने का भरपूर माद्दा है। पार्टी ने उन्हें चुनाव में ट्रंपकार्ड के तौर पर उतारा है। लगता है कि वे निराश भी नहीं करेंगे। उनके मुंह से बिहार के विकास और इसके भविष्य को लेकर जाहिर की जाने वाली चिंताएं मतदाताओं को खूब भा रही हैं।

एक अखबार में राहुल ने नीतीश के कार्यकाल में कराए गए विकास कार्यो पर कई सवाल खड़े किए हैं। अखबार कहता है- राहुल की नजरों में विकास वही जो सिर चढ़कर बोले। उनका कहना है कि लालू-राबड़ी के 15 सालों के विकास कार्यो से तुलना करने की बजाए नीतीश अपने काम-काज की बराबरी आंध्रप्रदेश के विकास कार्यो से करके दिखाएं। आज भी बिहार अन्य सूबों से पिछड़ा हुआ है।

दिल्ली का ‘सहाफत’ अपने संपादकीय में कहता है- देखना है कि नीतीश का विकास जमीन और मतदाताओं पर कितना असर डालता है। इस विधानसभा चुनाव में एक और खास बात देखने को मिल रही है। विभिन्न पार्टियों ने टिकट बंटवारे में पहले की तरह ही जातिवादी और सांप्रदायिक समीकरणों का पूरा ख्याल रखा है, पर हर वर्ग के मतदाता समीकरणों से ज्यादा विकास को अहमियत दे रहे हैं।

‘हमारा समाज’ अपने संपादकीय ‘मुसलमानों को नारा नहीं हिस्सेदारी चाहिए’ में कहता है- जदयू ने आबादी के लिहाज से दो प्रतिशत कुर्मी के 15 और राजद ने 75 यादवों को चुनाव मैदान में उतारे हैं। इसी तरह मुस्लिम आबादी के 80 प्रतिशत पिछड़ों को दरकिनार कर 20 प्रतिशत अगड़े मुस्लिम उम्मीदवारों में टिकट बांटा गया है।

इसके बावजूद जमियत उलेमा-ए-झारखंड-बिहार ने पटना के मदनी मुसाफिर खाना में एक सम्मेलन कर मुस्लिमों का अन्य बातों को छोड़कर उन उम्मीदवारों को अपना समर्थन देने का आह्वान किया है, जो विकास के प्रति खुला नजरिया रखते हैं। पटना के ‘कौमी तंजीम’ में अलहाज सैयद फखरूद्दीन एडवोकेट ने अपने लेख में मुस्लिम बुद्धिजीवियों से गुजारिश की है कि वे मुसलमानों को समझाएं कि वोट बैंक बनकर वोट देने के बजाय उनकी हिमायत करें, जो बाद में उनकी तरक्की और विकास का संबल बन सकें।

लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं
malik_hashmi64@yahoo.com

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