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सौन्दर्यीकरण का रोग

हमारे ऐतिहासिक शहर का सौन्दर्यीकरण हो रहा है। अपने पल्ले नहीं पड़ता है कि इस हसीन प्रक्रिया की पहली शर्त अनाप-शनाप खुदाई क्यों है? सड़कें हैं कि कई बीच से, कई किनारे से खुदी हैं। शायद हमारे अधिकारियों का नेक इरादा लम्बी और ऊंची कूद के खिलाड़ियों को भविष्य के एशियाड का अभ्यास करवाना है। भैया, अब हमारे प्यारे शहर में पधारे ही हो, तो रियाज भी कर लो। एक पंथ दो काज।

मन होता है कि इन कुशाग्र बुद्धि और देश को समर्पित अफसरों के सिर की गंज चूम लें। सुना है कि बुद्धि और कैश के धनी, अकसर केश से अकिंचन यानी खलवाट होते हैं! अपन तो कभी-कभी प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु, गंजा भले करो, पर धन से तो झोली भरो।

सुनवाई न करना सिर्फ सरकार की ही नही, ऊपरवाले की भी सिफत है। यह भी मुमकिन है कि ऊपरवाले के कुछ उसूल हों। इस गरीब देश में वह अफसरों को अधिकार व रोकड़ा-युक्त बनाता है। अफसरों की दौलत को ज्यादातर लोग भ्रष्टाचार की देन मानते हैं, तो कुछ पे-कमीशन का कमाल। हम क्यों छोटे मुंह बड़ी बहसों में उलझों।

सौन्दर्यीकरण से जुड़ी हमारी सीमित समस्या कदम-कदम पर गड्ढों की है। गड्ढे हैं, तो गंदा पानी है। गंदा पानी है, तो मच्छर हैं। मच्छर हैं, तो डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया, फाइलेरिया वगैरह हैं। हर बीमारी इस देश में लाइलाज है। डॉक्टर है, तो दवा नहीं है। दवा है, तो डॉक्टर नदारद है। दवा की दुकान का मालिक अब दारू बेचता है और समझाता है कि दवा क्या पता असली हो कि नकली? दारू शुद्ध है। मरना तो है ही, दारू चढ़ाकर ठाठ से टें बोलो। अपनी हसरत है कि शहर बदसूरत ही रहने दो। रोजमर्रा के रोगों से तो निजात मिले।

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