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भीतर से भरना

वह थक गए थे। काफी दिनों से कोई छुट्टी भी नहीं ली थी। उस प्रोजेक्ट में कहीं कोई राहत नहीं थी। उन्हें लगने लगा था कि अब खाली से हो गए हैं। कुछ नया सूझना बंद हो गया है।

एल्बर्ट आइंस्टाइन मेडिकल कॉलेज में साइकियाट्री के प्रोफेसर डॉ. बायराम करासू मानते हैं कि जब हम भीतर से खालीपन महसूस करते हैं, तो उसे भरने की जरूरत होती है। इसीलिए फुरसत में हमें कोई ऐसा काम करना चाहिए, जिससे मन खुश होता हो। तब हम भीतर से भरने लगते हैं। वह बेस्टसेलर ‘द आर्ट ऑफ सिरीनिटी’ और ‘द स्पिरिट ऑफ हैप्पीनेस’ के लेखक हैं।

दरअसल, कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे हम खाली वक्त में अपने को भर सकें। हम जब बाहर खेलते हैं, तो अपने बाहर को ही भरते हैं, लेकिन जब हम अपने भीतर खेलते हैं, तो खुद को भीतर से भरते हैं।

मसलन यों ही गाना गाना, सितार बजाना, सीटी बजाना, बागबानी करना, कुछ लिखना, खाना बनाना वगैरह। ढेर सारे काम हैं, जो आप कर सकते हैं, लेकिन फुरसत में इसी तरह के काम करने से आप भीतर से अपने को भरने लगते हैं। अक्सर हम काम करते हुए खुद को रीतता महसूस करते हैं। ऐसा लगता है, जैसे हम खाली हो गए हैं।

बिल्कुल ऐसे ही जैसे गाड़ी में होता है। चलते-चलते गाड़ी का ईंधन खत्म होने लगता है। हम तब क्या करते हैं? उसमें खट से ईंधन डलवा लेते हैं। और उसके भरते ही सब बदल जाता है। इसी तरह जिंदगी में होता है। हम काम करते-करते अपने को खाली कर लेते हैं। तब उसे भरने की जरूरत होती है। असल में हम भीतर से खाली होते हैं, तो उसे ही भरने की जरूरत होती है। अक्सर हमसे गड़बड़ यह होती है कि हम उसे बाहर से भरने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमें तो भीतर को भरना है।

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