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असंतुलित आबादी

भारत की जनसंख्या के स्थिर होने का जो लक्ष्य 2045 में रखा गया था, वह मौजूदा परिस्थितियों में 2070 तक खिसकने की आशंका है। इसका अर्थ यह है कि 2070 तक ही जनसंख्या की वृद्धि रुक पाएगी और उसके बाद जनसंख्या कम होना शुरू हो जाएगी। जनसंख्या में वृद्धि की दर नापने का पैमाना सकल प्रजनन दर कहलाता है जिसे अंग्रेजी में टोटल फर्टिलिटी रेट (टीएफआर) कहते हैं। 

टीएफआर का अर्थ है कि किसी समाज में प्रति दंपति औसतन कितनी संतानें पैदा होती हैं। अगर टीएफआर 2.1 हो तो जनसंख्या स्थिर होने लगती है और टीएफआर इससे कम जब होने लगती है तो जनसंख्या में कमी आने लगती है। विकसित देशों की टीएफआर दो से भी कम है इसलिए वहां जनसंख्या कम होती जा रही है।

भारत में फिलहाल लक्ष्य 2.1 तक पहुंचने का था लेकिन औसत टीएफआर अब भी 2.8 के आसपास है और तकरीबन 35 साल बाद ही 2.1 पर पहुंचेगी और उसके बाद पचीस साल बाद ही स्थिर होगी। ऐसा नहीं है कि ये आंकड़े पत्थर की लकीर हैं। जैसे हम अपना लक्ष्य चूक सकते हैं वैसे ही बदली हुई परिस्थितियों में लक्ष्य से बेहतर भी कर सकते हैं, लेकिन ये आंकड़े यह तो बताते ही हैं कि फिलहाल हम पिछड़ रहे हैं और हमें कुछ ज्यादा मुस्तैदी से कदम उठाने होंगे।

जनसंख्या की रफ्तार न रुकने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि आर्थिक विकास का पूरा लाभ हमें नहीं मिल पाता। लेकिन एक अच्छी बात यह है कि देश के 17 राज्यों में टीएफआर लक्ष्य को छू गई है बल्कि केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह दो से कम ही है यानी वहां आबादी घट रही है।

दिक्कत यह है कि उत्तर भारत के तमाम राज्यों में टीएफआर 3 से 3.9 तक है यानी आबादी बढ़ने का असली कारण ये राज्य हैं। आबादी कम करने की सबसे ज्यादा कोशिशें इन राज्यों में होना जरूरी है। 

विकसित देशों के और हमारे देश के दक्षिणी राज्यों के अनुभव से पता चलता है कि आबादी के नियंत्रण का प्रभावी तरीका जोर-जबर्दस्ती नहीं बल्कि शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार है।

समाज जितना पिछड़ा होगा, उसमें स्त्रियों की स्थिति उतनी ही बुरी होगी और जनसंख्या वृद्धि भी उतनी ही ज्यादा होगी। स्त्री शिक्षा और सशक्तीकरण का सीधा संबंध जनसंख्या नियंत्रण से है, इसलिए उत्तर भारत में बेहतर प्रशासन की, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं और स्त्रियों की हालत सुधारने की सख्त जरूरत है।

एक लोकतांत्रिक देश में चीन जैसी कड़ाई नहीं बरती जा सकती। चीन में तानाशाही के तरीकों से आबादी पर नियंत्रण तो हो गया लेकिन कई सामाजिक समस्याएं खड़ी हो गईं। अब ऐसा होने लगा है कि हर दंपति पर पति-पत्नी दोनों के माता-पिता और दादा-दादी, नाना-नानी की जिम्मेदारी होने लगी है। इससे आर्थिक दिक्कतें होने लगी हैं।

इसी नियम के चलते स्त्री-पुरुष अनुपात भी गड़बड़ हुआ है क्योंकि हर दंपति सिर्फ बेटा चाहते हैं, बेटी नहीं। पिछले दिनों एक खबर आई थी कि एक महिला को पीट-पीटकर उसकी दूसरी संतान का गर्भपात करवाया गया। जाहिर है ऐसी परिस्थिति हम अपने देश में नहीं चाहते, लेकिन लोकतंत्र का अर्थ अक्षमता और असफलता नहीं होना चाहिए। हमें साबित करना होगा कि लोकतांत्रिक तरीकों से भी हम जनसंख्या को नियंत्रित कर सकते हैं।

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