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‘मिशन कश्मीर’ पर पहुंचे वार्ताकारों का पहला दिन रहा व्यस्त

जम्मू एवं कश्मीर के लिए केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त वार्ताकारों का यहां पहला दिन काफी व्यस्त रहा। वार्ताकारों के दल ने अखबारों के संपादकों से बातचीत की तो केंद्रीय जेल जाकर समय बंद राजनीतिकों के साथ बिताया। इसके अलावा स्थानीय गुज्जरों के प्रतिनिधिमंडल ने भी दल से मुलाकात की।

वार्ताकार दिलीप पडगांवकर, राधा कुमार और एमएम अंसारी मिशन कश्मीर पर शनिवार को यहां पहुंचे। सूत्रों के मुताबिक यह दल राज्यपाल एनएन वोहरा से भी मिलेगा। दो अंग्रेजी अखबारों के सम्पादकों ने वार्ताकारों के दल से मुलाकात की और 63 साल पुरानी कश्मीर समस्या के समाधान का रास्ता निकालने पर चर्चा की। राज्य के पुलिस महानिदेश कुलदीप खोड़ा से भी यह दल मिला।

पडगांवकर ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, ‘हम यहां ध्यानपूर्वक सभी को सुनने आए हैं।’ वार्ताकारों ने केंद्रीय कारागार जाकर वहां भी कुछ समय बिताया और वहां बंद नेताओं से मुलाकात की। इससे पहले यह दल सारिका देवी मंदिर गया और वहां पूजा अर्चना की। शनिवार को दल के सदस्यों ने हजरत बल दरगाह पर चादर चढ़ाई।

बहरहाल, यह दल आधिकारिक प्रोटोकॉल तोड़कर घाटी में आम कश्मीरियों से मिलकर वार्ता करने की कवायदों से एक बार फिर यहां के लोगों में इस समस्या के समाधान को लेकर उम्मीदें जगने लगी हैं। वार्ताकारों के लोगों से मिलने और उनसे बेहिचक बातचीत करने से यह संकेत मिलता है कि यह दल गत 63 वर्षों से चले आ रहे कश्मीर विवाद के हल को लेकर कितना गंभीर है।

ज्ञात हो कि वार्ताकारों का नेतृत्व कर रहे पडगांवकर ने कश्मीर समस्या को ‘विवाद’ कहकर राजनीतिक दलों को बोलने का मौका दे दिया है। वरिष्ठ पत्रकार रियाज मसरूर ने बताया, ‘पडगांवकर द्वारा कश्मीर समस्या को विवाद बताया जाना केंद्र सरकार व राष्ट्रीय नेताओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले सामान्य संदर्भो से न सिर्फ जुदा है बल्कि अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी से मिलता जुलता है।’

उन्होंने कहा कि पडगांवकर का यह कहना कि इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए पाकिस्तान को साथ लेकर चलना जरूरी है, संकेत करता है कि वार्ताकारों ने इस समस्या को अंतर्राष्ट्रीय दिशा देना स्वीकार कर लिया है। ज्ञात हो कि गिलानी ने जम्मू एवं कश्मीर पर वार्ता के लिए केंद्र सरकार के समक्ष जो पांच सूत्रीय मांगें रखी थी उसमें सबसे पहला यही था कि भारत को कश्मीर को अंतर्राष्ट्रीय विवाद स्वीकार कर लेना चाहिए।

यहां के एक स्थानीय कॉलेज के प्रोफेसर मुजफ्फर अहमद का मानना है, ‘समय आ गया है कि कश्मीर को विवाद के रूप में स्वीकार कर लिया जाए और बगैर वक्त जाया किए इसका समाधान करना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ‘यदि वार्ताकारों का मिशन असफल रहता है तो इसके समाधान की उम्मीदें हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी।’

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