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चाँद से बरसेगी चाँदी

चन्द्रमा की सतह धरतीवासियों के लिए अब अनजानी नहीं रह गई है। हम उसकी ‘गलियों’ को जान गए हैं। चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर एक स्थान है केवियस जहां हमेशा घटाटोप अंधेरा रहता है। अमेरिकी अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को लगा यहां हो न हो चांद का कोई खजाना गड़ा हुआ है। ल्यूनर क्रेटर आब्जर्वेशन एंड सेंसिग सेटेलाइट (एलसीआरओएसएस) जिसे गत वर्ष छोड़ा गया था, का एक खास उद्देश्य था।

असल में इसी के द्वारा एक खाली रॉकेट को चन्द्रमा के इसी अंधियारे क्षेत्र में जानबूझ कर ठोका गया। इसके पीछे मकसद था क्षेत्र विशेष की माटी को टटोलना। इससे जुड़ा एक एलआरओ यानी ल्यूनर रिकोनेसां ऑर्बिटर चन्द्रमा के चारों चक्कर काटता रहा और हर फेरे में वहां हो रहे परीक्षणों की फोटो उतारता रहा।

पूरा परीक्षण अत्यंत संवेदी और प्रभावी उपकरणों पर आधारित था, यही कारण था कि इसके द्वारा बहुत ही चौंकाती छवियां आईं जिसमें रॉकेट का सतह पर टकराना, धूल कण उड़ना, छोटे-छोटे गड्ढे बनना, मलबा गिरना, स्थिर होना शामिल था। इसी परीक्षण से जुड़े परिणामों की शोधपरक रिपोर्ट नासा द्वारा जारी की गई।

पहली बार जब अमेरिकी मून मिशन ने चन्द्रमा की सतह पर उतरने में सफलता पाई थी तो उसका यान वहां से चाँद की चट्टानों के कुछ नमूने भी लाया था। ज्ञात हो कि अमेरिका द्वारा 20 जुलाई 1969 को अपोलो-11 यान चांद पर उतारा गया था। इसके बाद तो अमेरिका द्वारा कई सफलताएं प्राप्त की गईं।

वर्ष 1969 में ही 14 नवम्बर के दिन अपोलो-12,  इसके बाद 31 जनवरी 1971 को अपोलो-14 चाँद पर उतरा, 1971 में ही 26 जुलाई को अपोलो-15, 16 अप्रैल 1972 को अपोलो-16 और दिसम्बर 1972 में अपोलो-17 ने एक के बाद एक अंतरिक्ष यात्री चाँद पर उतारे। यह लोग चाँद की सतह से मिट्टी और चट्टान के नमूने लेकर लौटे थे। इनके नमूने विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों को शोध के लिए सौंपे गए थे।

भारत को भी अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था ने चाँद के नमूने लोन के तौर पर इस वायदे के साथ दिए थे कि वह प्रयोगशाला में इनका विश्लेषण कर, परिणामों से नासा को अवगत कराए। अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी के अनुसार भारत के पास भी चन्द्रमा की मिट्टी व चट्टानों के नमूने हैं, जो अमेरिका और रूसी चन्द्र अभियानों के दौरान पृथ्वी पर लाए गए थे।

भारत को दिए गए सारे नमूने प्रयोगशाला में मौजूद हैं। नासा द्वारा चाँद के 90 प्रतिशत नमूनों को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा गया है। भारत द्वारा चाँद की मिट्टी का जो विश्लेषण किया गया है, वह नासा वैज्ञानिकों के विश्लेषण परिणाम से मेल खाता है। इसकी पुष्टि की जा चुकी है कि यह चट्टानें खनिज तत्वों की धनी हैं और भविष्य में पृथ्वीवासियों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होंगी।

इन सफलताओं से नासा तथा अन्य देशों के वैज्ञानिकों को विश्वास हो चला है कि जल्द ही ग्रहों एवं उपग्रहों पर खनिजों के भरपूर भंडार तलाश लिए जाएंगे। इनका प्रयोग धरती की मिट्टी को और भी उर्वरक बनाने में किया जा सकेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह खनिज तत्व अपेक्षाकृत अधिक गुणवत्ता वाले हैं।

रिपोर्ट को स्पष्ट करते हुए पीटर शुल्ज कहते हैं कि चाँद के अंधेरे क्षेत्र जो उसके दक्षिणी ध्रुव पर स्थित है, में वाकई खनिज तत्वों और यौगिकों का खजाना है। रिपोर्ट बताती है कि यहां विभिन्न तत्वों के अलावा भारी मात्र में हल्के हाइड्रोकार्बन, कार्बन मोनोआक्साइड, कार्बन डाइआक्साइड, अमोनिया युक्त सोडियम, पारा, मैग्नीशियम और यहां तक कि चांदी भी है। सबसे हैरान करती बात तो यह है कि यहां की मिट्टी में आक्साइड के रूप में आक्सीजन उपस्थित है। यह यहां पर जीवन की पुष्टि करती है।

भारत द्वारा पानी होने का दावा भी इससे बल पाता है। यही नहीं, इस माटी में खासी मात्रा में पोटेशियम, सोडियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, टाइटेनियम, एल्युमिनियम, सिलिकॉन, क्रोमियम, गंधक, फॉस्फोरस आदि भी समाहित हैं।

हम किसी से कम नहीं
भारतीय चन्द्रयान-1 में इससे संबंधित विशेष प्रकार के उपकरण लगाए गए थे। इनमें मून मिनरोलॉजी मैपन (एम-37), हाइपर स्पैक्ट्रल इमेजर (एचवाईएसआई) और नियर इन्फ्रारैड स्पैक्ट्रोमीटर (एसआईआर-2) प्रमुख उपकरण हैं। इन तीनों उपकरणों की विशेषता यह है कि यह अत्यंत संवेदी हैं और बारीक से बारीक जानकारी पकड़ उसे प्रेषित करने की क्षमता रखते हैं।

इससे चाँद की समूची सतह की हाई रेजोल्यूशन माइन मैपिंग होती है। इस तरह से विभिन्न स्थानों के खनिज मानचित्र प्राप्त करना संभव हो पाता है। इस संदर्भ में टीएससी यानी टेरेन मैपिंग कैमरा भी विशेष तौर पर उल्लेखनीय है।

इस कैमरे द्वारा चाँद पर विद्यमान उठाव, गड्ढों, सपाट, लहरदार स्थानों की जानकारी प्राप्त करना संभव हो पाया। वर्तमान रिपोर्ट में भारतीय वैज्ञानिक इसरो के डॉ़ आर. श्रीधरन का कहना है कि उनके दल द्वारा चाँद के वातावरण का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया जिससे जल तथा कार्बन डाइ-आक्साइड होने की पुष्टि हुई। 

इधर वैज्ञानिकों ने यह भी दावा किया है कि न केवल बड़े ग्रहों बल्कि क्षुद्र ग्रहों पर भी खनिज तत्वों की प्राप्ति संभव है। ठीक इसी प्रकार अन्य ग्रहों जैसे मंगल, शुक्र, बृहस्पति आदि पर भी खनिज तत्वों की प्राप्ति की पुष्टि हुई है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी अन्य ग्रह पर कभी न कभी इस प्रकार का वातावरण विकसित हुआ जिसने उसके धरातल को उर्वरक बनाया परंतु किन्ही कारणों से उसमें बदलाव आए और कुछ महत्वपूर्ण तत्व गर्त में चले गए। उनका विश्वास है कि यदि इन ग्रहों पर खुदाई की जाए तो भारी मात्रा में महत्वपूर्ण खनिज तत्वों की प्राप्ति होगी।

खगोलीय पिंड भी खंगाले जा रहे हैं
इस श्रृंखला में खगोलीय पिंडों को भी खंगाला जा रहा है। खगोलीय पिंड अपने अंदर अपार खनिज तत्व और बहुमूल्य धातुएं समोए हुए हैं। हालांकि इनका अध्ययन खतरे के आधार पर अधिक हुआ है, परंतु इसका दूसरा महत्वपूर्ण पहलू इनसे प्राप्त खनिज भी हैं जो आज के परिवेश में अधिक मान्य हैं। इनका अध्ययन और इनकी पकड़ दोनों ही संभव है, मगर इस बात की पूरी समस्या सामने आती है कि इनसे दोहित तत्वों को धरती पर भेजा कैसे जाए?

इसलिए वैज्ञानिकों की सोच बनी है कि क्यों यह भी संभव है कि इन तत्वों को अंतरिक्ष की कक्षा में ही प्राप्त किया जाए और फिर विभिन्न रासायनिक उपचारों के उपरांत उन्हें धरती पर उपयोग के लिए पहुंचाया जाए। इस तरह से प्राप्ति और रासायनिक क्रियाओं के कारण जो भी प्रदूषण या अवांछित घटना हो, वह वहीं हो, धरती के वातावरण में न हो। मगर यह क्रिया इतनी सहज नहीं है जितनी सोची जा रही है।

इसके लिए अत्यंत संवेदी उपकरण, कैमरे और अन्य अध्ययन तथा क्रियान्वयन सामग्री जुटानी होगी। चूंकि खगोलीय पिंडों से धातुओं की प्राप्ति एक कमाई का सौदा होगी। लिहाजा विभिन्न देशों द्वारा इस दिशा में अनुसंधान प्रारंभ भी कर दिए गए हैं। 

चाँद पर तैयार होंगे खनिज तत्व
भारतीय चन्द्र अभियान की सफलता ने वहां से खनिज तत्वों की प्राप्ति का भी रास्ता खोल दिया है। जब चांद की चट्टानों या कणों को उकेर पानी प्राप्त करने की दिशा में प्रयास होंगे तो खनिजों से भी मुलाकात होगी। हालिया नासा रिपोर्ट बताती है कि मून मिनरोलॉजी मैप यानी एम-3 से इस संदर्भ में विश्लेषणात्मक आंकड़े प्राप्त हुए हैं।

इस प्रकार के कुछ आंकड़े अन्य उपकरण मून इफैक्ट प्रोब से भी मिले हैं। दोनों एक दूसरे की सत्यता की पुष्टि करते हैं। इस दिशा में नासा वैज्ञानिकों के हाल के अध्ययन सामने आए हैं। वैज्ञानिकों द्वारा प्राप्त खनिजों की वेव लैंथ में निहित परावर्तित प्रकाश का अध्ययन किया और उसी आधार पर चाँद की सतह और उसकी माटी का 97 प्रतिशत तक अध्ययन कर डाला।

प्रस्तुत अध्ययन के लिए चांद का लगभग 25-30 मीटर लम्बा क्षेत्र चुना गया जहां से 4000-6000 किलोग्राम मलबा, धूल और वाष्प प्राप्त हुई। मानव ने धरती के प्राकृतिक संसाधनों का जैसे दोहन किया है, वह उसी प्रकार अन्य ग्रहों से भी खनिज संसाधनों के दोहन की सोचे बैठा है। इस दिशा में कदम भी उठाए जा रहे हैं। मगर यह भी सोचना होगा कि यह दोहन कहीं पृथ्वी के लिए कोई गलत प्रभाव न छोड़े।

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