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गुरुत्वाकर्षण तरंगें साधने का प्रयास

गुरुत्वाकर्षण-तरंगें यानी ग्रेविटेशनल वेव्स (जीडब्ल्यू) विज्ञान के सबसे बड़े रहस्यों में हैं। ये तरंगें हमारे ब्रह्मांड से प्रकाश की गति से गुजरती हैं और यह माना जाता है कि बड़ी-बड़ी ब्रह्मांडीय घटनाओं जैसे दो ब्लैक होल्स की टक्कर के दौरान इनका निर्माण होता है। लेकिन इन अदृश्य तरंगों का पता लगाना मुश्किल है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक शताब्दी पूर्व इनके अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी। 

खगोलशास्त्रियों का मानना है कि यदि हम ग्रेविटेशनल वेव्स का पता लगाने में कामयाब हो जाते हैं तो इससे न सिर्फ आइंस्टीन के अनूठे सिद्धांत की पुष्टि होगी, बल्कि इनसे ब्रह्मांड की अबूझ पहेलियों को भी सुलझाने में मदद मिलेगी।

इससे अंतरिक्ष की एकदम दूसरी तस्वीर हमें मिल सकती है, जो प्रकाश और एक्सरे जैसे विद्युत-चुंबकीय विकिरण के डिटेक्शन पर आधारित न होकर किसी और ही चीज पर आधारित होगी। इससे हमें ब्लैक होल्स में झांकने का मौका भी मिल सकता है। आइंस्टीन की थ्योरी के मुताबिक ब्लैक होल अंतरिक्ष में एक ऐसी जगह है, जहां ग्रेविटी इतनी ज्यादा ताकतवर होती है कि वहां से प्रकाश भी नहीं गुजर सकता।

ग्रेविटेशनल वेव्स इंटरनेशनल कमेटी की पहल पर दुनिया भर में 800 से अधिक वैज्ञानिक इन अदृश्य तरंगों का पता लगाने में जुटे हुए हैं। इसके लिए अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कई मशीनें लगाई गई हैं। इन मशीनों को अपग्रेड किया जा रहा है ताकि वे ग्रेविटेशनल वेव्ज़ के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाएं।

अमेरिका में लेसर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्जरवेटरी (लिगो) को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस ऑब्जरवेटरी में दो डिटेक्टर हैं, जिनमें से एक वाशिंगटन और दूसरा लुसियाना में स्थापित किया गया है। यह ऑब्जरवेटरी 2015 में उन राष्ट्रीय तरंगों की खोज शुरू करेगी, जिनके बारे में आइंस्टीन ने खुद कहा था कि हम शायद कभी इन्हें खोज नहीं पाएंगे। लिगो चार किलोमीटर लंबी दो लेसर तरंगों का इस्तेमाल करता है। ये तरंगें ‘एल’ आकार में अरेंज की गई हैं।

इन रहस्यपूर्ण तरंगों को खोजने के अंतरराष्ट्रीय अभियान में भारतीय वैज्ञानिक भी शामिल हैं तथा इंस्टिटय़ूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च ने अभी हाल ही में एक प्रोटोटाइप जीडब्ल्यू डिटेक्टर लगाने के लिए दो करोड़ रुपये के प्रस्ताव की अनुमति दे दी है। यह तीन मीटर लंबा डिटेक्टर भारतीय खगोल वैज्ञानिकों की जीडब्ल्यू रिसर्च का पहला कदम होगा।

भारत का इरादा 2020 तक एक चार किलोमीटर लंबी इंटरफेरोमीट्रिक ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जरवेटरी स्थापित करने का है। जीडब्ल्यू रिसर्च के लिए भारतीय वैज्ञानिक समूह में भारत के नौ प्रमुख प्रतिष्ठानों के रिसर्चरों सहित 26 वैज्ञानिक शामिल हैं।

जब ग्रेविटेशनल वेव्स पृथ्वी से गुजरती हैं तो वे डिटेक्टर्स की लेसर लाइट को छोड़ कर रास्ते में आने वाली हर वस्तु में सूक्ष्म विकृतियां उत्पन्न करती हैं। वैज्ञानिक को ग्रेविटेशनल वेव्स के अस्तित्व का पूरा भरोसा है। उनका मानना है कि यह मशीन इन तरंगों की उपस्थिति का पता लगा सकती हैं। यदि यह साबित हो जाता है कि इन तरंगों का कोई अस्तित्व नहीं है तो हमें फिजिक्स के नियम फिर से लिखने पड़ेंगे क्योंकि अभी हम जितनी चीजें जानते हैं, वे सब आइंस्टीन की थ्योरी पर आधारित हैं।

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