DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बदलाव की बयार और बिहार

पिछले ही दिनों बिहार से लौटा हूं। हर बार की तरह इस बार भी पाटलिपुत्र की धरती ने मुझे नई ऊर्जा और उमंग दी है। गांधी मैदान में उस दिन एक विनोदप्रिय व्यक्ति अपने अनोखे अंदाज में पार्टियों के चुनाव चिन्हों के चरित्र का आकलन कर रहे थे। गजब का विश्लेषण था। दर्जनों लोग उनके श्रोता थे और रह-रहकर ठहाके फूट पड़ते थे। 

इसके बाद तमाम लोगों से मिला। हरेक के बात करने का अंदाज अलग था। कोई व्यंग्य बोल रहा था, तो कोई गुस्से में था। किसी की भाषा सदियों से शांत बहती नदी की तरह थी, तो कोई आग उगल रहा था, पर सबमें एक कसमसाहट थी। ये कसमसाहटें सिर्फ इस पट्टी का ही नहीं बल्कि पूरे देश का भाग्य निर्धारित करती रही हैं।

यह बिहार की महान जनता है, जिसे क्रांतियां करने की आदत है। महापद्म नंद के वंशजों ने सोचा भी नहीं होगा कि उनकी कुनीति लोगों में गुस्सा जगा रही है। वे अंदर ही अंदर खौलते रहे, तिलमिलाते रहे और सुगबुगाते रहे। परिणाम आज काल के अमिट पन्नों पर दर्ज है।

पाटलिपुत्र संसार की सबसे पहली राज्य क्रांति का गवाह बना। इतिहास इस बात को चिल्ला-चिल्ला कर कहता है कि चाणक्य की अगुवाई में आम आदमी ने नंद सम्राट का तख्ता पलट दिया। उसकी जगह चंद्रगुप्त मौर्य को गद्दी पर बैठाया गया, पर इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता कि यह क्रांति कैसे हुई? कितना खून बहा? नंद राजा और उसके परिवार का क्या हुआ? पर इस क्रांति का एक सबक यह भी है कि बिहार की धरती अक्सर अचंभे पैदा करती है।

इस राज्य क्रांति से बरसों पहले इसी जागृत भूमि में महावीर और कपिल मुनि ने भी अलख जगाई थी। उनकी लड़ाई को कुछ लोग सत्ता की सियासत से भी जोड़ते हैं। इतिहासकारों का एक वर्ग मानता है कि ये दोनों राजकुमार थे और इन्होंने प्रचलित ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ धार्मिक क्रांति की। मुझे ऐसा नहीं लगता। अगर बुद्ध और महावीर की परिवर्तनवादी कोशिशें अनश्वर साबित हुईं तो इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि वे समाज से जुड़ी हुईं थीं। सियासत अक्सर समाज के खिलाफ चली जाती है।

बहुत दूर क्यों जाएं? जयप्रकाश बाबू को याद करते हैं। उन्होंने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का नारा सिर्फ सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं दिया था। वह कुनीति से आजिज आए हुए एक बुजुर्ग की व्यवस्था-परिवर्तन की आवाज थी, पर उनके जीते जी ही राजनीति के महारथियों ने इस आंदोलन को लपक लिया। पता नहीं बीमारी और बुजुर्गियत से जूझते जेपी, मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चौधरी चरण सिंह को सत्ता के लिए कलह रत देख क्या सोचते होंगे?

कभी गांधी के साथ भी ऐसा ही हुआ था। उनके सामने ही उनके शिष्यों ने वर्चस्व के लिए उनके सिद्धांतों की मनमानी व्याख्या शुरू कर दी थी। 30 जनवरी, 1948 को गोडसे की गोलियों ने भले ही बापू की देह को छलनी किया हो पर उनके चेलों ने जीते जी ही कई बार उनके भरोसे को तोड़ा था। 

बुद्ध और महावीर से लेकर बापू और जेपी तक सद्विचार तब तक जिंदा है, जब तक वह समाज के सभी तत्वों को प्रभावित करता है। इस नाते मैं बिहार के मौजूदा चुनाव को बहुत महत्वपूर्ण मानता हूं। क्यों? जवाब साफ है। बिहार के इन चुनावों को तय करना है कि वे जाति के बंधनों में ही कैद रहेंगे या अपनी तरक्की पसंदगी का सबूत देंगे?

यह चुनाव यह भी तय करेगा कि बिहार के लोग तेजी से दौड़ती दुनिया में खुद को शामिल करने के लिए किस तरह के विधायकों का चुनाव करते हैं। इन्हीं चुनावों से यह भी निर्धारित होना है कि उत्तर भारतीय राज्यों के उदय में इस भूमि का आने वाले दिनों में क्या योगदान होगा? कहने की जरूरत नहीं कि कई कारणों से बिहार को शेष भारत के लोग कोसते रहे हैं। बीमारू राज्यों के नामों की शुरुआत ही बिहार से होती है। बिहार पहले ऐसा नहीं था। यह चुनाव निर्धारित करेंगे कि बिहार आगे ऐसा रहेगा या नहीं?

ध्यान रखिए। लाखों लोग पहली बार इस चुनाव में वोट डालेंगे। इस लेख का सबसे बड़ा मकसद उन लोगों को चेताना है। ये वो नौजवान हैं जिन पर 21वीं शताब्दी के भारत के निर्माण की जिम्मेदारी है। कभी उनके पुरखों ने जयप्रकाश नारायण के साथ आवाज बुलंद की थी। परिणाम अद्भुत थे। पर इस सुखद सच के साथ एक दुखद तथ्य यह भी जुड़ा है कि जेपी वादियों ने ही सत्ता के लालच में उनके सिद्धांतों की बखिया उधेड़ दी थी। क्या नौजवान पीढ़ी इस पाप से मुक्ति का अभियान चलाएगी? इसके लिए इन चुनावों से बेहतर समय फिर कभी नहीं आएगा।

यह ठीक है कि जातिप्रथा हिन्दुस्तानी समाज की हकीकत है। सिर्फ हिन्दू ही नहीं बल्कि वे धर्म जिनकी नींव समानता पर टिकी हुई है, उनके अनुयायी भी इस प्रथा के शिकार होते रहे हैं। बिहार का ही उदाहरण ले लीजिए। यहां पर पसमांदा और गैर-पसमांदा मुसलमानों के बीच में गहरा विभेद है। इसे जातिप्रथा से जोड़ा जाता है।

इसीलिए जाति गले की जंजीर न बने, इसे साबित करने का वक्त आ गया है। जब पूरी दुनिया धर्म, क्षेत्र, वर्ग और वर्ण विभेद से ऊपर उठकर एक गांव में तब्दील हो रही है तब बिहार की नौजवान पीढ़ी को यह तय करना है कि वह विकासशील दुनिया की रफ्तार के साथ दौड़ना चाहती है या फिर उन्हीं धूल और कांटोंभरी पगडंडियों पर भटकना चाहती है, जिन्होंने बिहार को धूलधूसरित और लहूलुहान कर रखा है। यह चुनाव तरक्की बनाम पिछड़ेपन का चुनाव है।

हमें भूलना नहीं चाहिए कि पिछले बीस साल में हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियत दोनों ने तरक्की की कई सीढ़ियां तय की हैं। अयोध्या विवाद पर आया ताजा फैसला इसकी जीती-जागती मिसाल है। जहां 1990 में लोग इस मुद्दे पर मरने-मारने को आमादा हो रहे थे, वहीं 2010 में इतने विवादास्पद मुद्दे पर हुए निर्णय को लोगों ने बेहद शांति और संयम से लिया है।

इक्कीसवीं शताब्दी के परिपक्व होते भारतीय लोकतंत्र में सांप्रदायिकता का विष यदि कम हुआ है तो आज नहीं तो कल जातीय जहर का डंक भी टूटता नजर आएगा। बिहार ने कई बार हिन्दुस्तान का नेतृत्व किया है। यह चुनाव यहां के लोगों को एक बार फिर से यह मौका दे रहा है।

पहले चरण के चुनाव में बिहार के लोगों ने अपनी सियासी जिम्मेदारियों को साबित कर दिया है। वे पोलिंग बूथों पर जिस तरह से उमड़े उससे तय हो गया कि इन आठ जिलों की 47 विधानसभाओं के लोग अपनी पसंद की हुकूमत चाहते हैं।

चुनाव आयोग की सख्ती के कारण हिंसा या आतंक का वातावरण नहीं बन सका, यही वजह है कि पहले चरण में 55 प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया जो पिछली बार से 08 प्रतिशत ज्यादा है। उम्मीद है इस जागृत प्रदेश के लोग अगले चरणों में और भी जमकर मतदान करेंगे ताकि बिहार के बदलाव में उनकी भूमिका पहले के मुकाबले और बड़ी हो सके।

shashi.shekhar@hindustantimes.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:बदलाव की बयार और बिहार