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लीबिया में फंसे भारतीयों के परिजनों की सरकार से गुहार

लीबिया की एक पाकिस्तानी कंपनी में काम करने के लिए करार पर वहां गए सूबे के लोगों के परिजनों ने शनिवार को सरकार से उन्हें वापस लाने के लिए हरसंभव मदद करने की मांग की और गुहार लगायी कि उनके परिजनों को वापस बुलाने में सरकार उनकी सहायता करें।

लोगों ने शनिवार को यहां बताया कि जालंधर के रमेश भाटिया नामक एक एजेंट ने उन्हें लीबिया की एक पाकिस्तानी कंपनी में काम करने के लिए दो साल का करार करा कर लीबिया भेजा था। जिस कंपनी के साथ उनका करार हुआ था, बाद में वह कंपनी बंद हो गई। उनके परिजनों के पासपोर्ट लीबियाई आव्रजन विभाग के पास है। ये लोग वहां 2008 में गए थे।

उनका यह भी कहना था कि आव्रजन विभाग उनसे पासपोर्ट के बदले वो 80 हजार रुपये मांग रहे हैं, जो कंपनी को उन्हें देने थे। कंपनी ने आव्रजन विभाग को ये धन नहीं दिया और पासपोर्ट नहीं मिलने से उनके परिजन वहां फंस गए हैं।
    
इन लोगों के अनुसार लीबिया में फंसे भारतीयों की कुल तादाद 108 है। लोगों का यह भी कहना है कि सरकार इस मामले में हस्तक्षेप कर उनके परिजनों को वापस अपने देश लाने में मदद करें। केंद्र सरकार लीबिया सरकार के समक्ष इस मुद्दे को उठाये अथवा पैसे जमा कराये लेकिन हमारे परिजनों को वापस बुलाए।
    
कुछ लोगों का कहना था कि कंपनी बंद हो जाने से वहां रह रहे भारतीय श्रमिकों को कोई सुविधा नहीं मिल रही है। उनके पास न रहने के लिए घर है और न सोने के लिए बिस्तर। उनके पास खाना खाने तक के पैसे नहीं हैं।

करतारपुर निवासी गिरधारी लाल ने रोते हुए मीडिया को बताया कि उनके बेटे के जालंधर के रोजगार इंटरनेशनल ने लीबिया भेजा, जहां उसे दो साल तक एक कंपनी में काम करना था। इसके लिए गिरधारी ने एजेंट को तकरीबन एक लाख 25 हजार रुपये का भुगतान किया था।
    
उनके अनुसार कंपनी तकरीबन 14 महीने बाद बंद हो गई। वहां के अधिकारी धीरे-धीरे फरार हो गए। उनके बच्चों का पासपोर्ट आव्रजन विभाग में फंसा रह गया।
    
इस प्रकरण के बाद लीबिया से वापस भारत भेजे गए एक युवक प्रेमनाथ ने बताया कि हमें पर्यटन वीजा पर तीन महीने के लिए यहां से वहां भेजा गया। इसके बाद वहां दो साल का करार हो गया। इस बीच वीजा तथा अन्य शुल्क कंपनी को आव्रजन विभाग को भुगतान करना था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। यही कारण है कि लोग वहां फंस गए हैं।

वहां रह रहे लोगों के बारे में प्रेमनाथ ने कहा कि उनके पास काम नहीं है। भारतीय वहां किसी तरह खाना खा रहे हैं। वे सड़क के किनारे सोने को मजबूर हैं और पांच दीनार की दिहाडी पर लोग काम कर रहे हैं।
    
लीबिया में भारतीय दूतावास से मदद के बारे में पूछे जाने पर उषा रानी कहती हैं कि वहां फंसे उनके पति रूपलाल ने कई बार संपर्क किया लेकिन हर बार आश्वासन मिलता रहा कि दो दिन रूक जाईए सब कुछ ठीक हो जाएगा। धीरे धीरे आठ महीने होने वाले हैं, लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हुआ है।

इस बारे में फगवाडा निवासी दिलीप कुमार ने बताया कि उनके बेटे रवि कुमार के पासपोर्ट की तारीख भी समाप्त हो चुकी है। उनका कहना है, उसका क्या होगा अब तो भगवान ही मालिक है। हम तो चाहते हैं कि हमारा बेटा जल्दी घर आ जाये।
    
लुधियाना के रहने वाले परमजीत सिंह ने बताया कि साढ़े तीन सौ अमेरिकी डालर प्रति माह पर उनका बेटा वहां काम करने गया था, लेकिन एक साल के कुछ समय बाद ही कंपनी बंद हो गई और उनके बेटे का पासपोर्ट आव्रजन विभाग में जमा है।
    
इस मामले में लोकभलाई पार्टी के प्रमुख तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया कहते हैं कि यह सरकारों की गलती है, जिसके कारण ऐसा होता है। इस दिशा में एक बेहतर और अच्छा कानून बनना चाहिए, जो लोगों की सुरक्षा विदेशों में भी सुनिश्चित कराये।
    
रामूवालिया ने कहा कि हम केंद्रीय प्रवासी ममलों के मंत्री वायलार रवि से बातचीत कर रहे हैं और जरूरत पडी तो हमारी पार्टी के लोग त्रिपोली (लीबिया की राजधानी) जाएंगे और वहां भारतीय राजदूत से मुलाकात कर इनकी समस्याओं को सुलझाएंगे।

इस बीच जालंधर के रोजगार इंटरनेशनल के एजेंट रमेश भाटिया से संपर्क नहीं हो सका। कुछ लोगों ने बताया कि वह अपनी संपति बेच कर अपने परिजनों को वापस आने के लिए पैसा भेजा है। दूसरी ओर, लीबिया से जबरन वापस भेजे गए युवकों के एक दल ने मंगलवार को एजेंट के कार्यालय के समक्ष जमकर प्रदर्शन किया और अपने रुपये वापस मांगे थे।

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  • Web Title:लीबिया में फंसे भारतीयों के परिजनों की सरकार से गुहार