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गरीबों को तीन रुपये में चावल, दो रूपये में गेहूं

गरीबों को तीन रुपये में चावल, दो रूपये में गेहूं

देश की 80 करोड जनता को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत सस्ते दाम पर अगले साल से अनाज मिलना शुरु हो जाएगा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन लाया जाएगा।

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने प्रस्तावित एवं बहुचर्चित खाद्य सुरक्षा विधेयक को शनिवार को अंतिम रुप दे दिया जिसमें प्रत्येक बीपीएल परिवार को हर माह 35 किलोग्राम अनाज यानी चावल तीन रुपए किलो, गेहूं दो रुपए किलो और बाजरा एक रुपए किलो के हिसाब से देने की सिफारिश की गई है। गैर-बीपीएल परिवार को प्रत्येक महीने 20 किलो अनाज न्यूनतम समर्थन मूल्य की आधी कीमत पर देने का प्रस्ताव किया गया है।

संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की बैठक में खाद्य सुरक्षा विधेयक को शनिवार को नीतिगत तौर पर अंतिम रुप दिया गया जिसमें यह प्रावधान किए गए हैं। 

बैठक में प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक एवं सांसद प्रो. एमएस स्वामीनाथन, सांसद रामदयाल मुंडा, प्रो. नरेंद्र जाधव, ज्यां व्रेज, अरुणा राय, माधव गाडगिल, एनसी सक्सेना, दीप जोशी, फराह नकवी, हर्ष मांडर, माधव गाडगिल तथा प्रमोद टंडन ने भाग लिया।

योजना आयोग के सदस्य जाधव ने बैठक के बाद विधेयक के प्रस्तावों की जानकारी देते हुए बताया कि आम जनता को महंगाई से राहत दिलाने के लिए सरकार ने इस विधेयक को तैयार किया है और मंत्रिमंडल द्वारा राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सिफारिशों को मंजूर करने के बाद यह विधेयक संसद में पेश किया जाएगा।
 
यह पूछे जाने पर कि यह विधेयक क्या संसद के अगले सत्र में लाया जाएगा, जाधव ने इसकी कोई जानकारी नहीं दी पर उन्होंने कहा कि यह कानून अगले साल से लागू हो जाएगा।

उन्होंने बताया कि सरकार अभी 56 हजार 700 करोड़ रुपए की सब्सिडी खाद अनाजों पर दे रही है। पहले चरण में 15137 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी तथा अंतिम चरण में 15137 करोड रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी देगी यानी कुल मिलाकर 38 हजार करोड रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी सरकार देगी और कुल चार करोड 90 लाख टन अतिरिक्त अनाज दिया जाएगा।

उन्होंने बताया कि पहले चरण में औसतन तथा अंतिम चरण में 78 प्रतिशत यानी औसतन 75 प्रतिशत आबादी इससे लाभान्वित होगी इस तरह 80 करोड जनता को लाभ मिलेगा।

उन्होंने बताया कि पहले चरण में 85 प्रतिशत ग्रामीण आवादी तथा अंतिम चरण में 90 प्रतिशत ग्रामीण आबादी इस योजना से लाभान्वित होगी। जबकि पहले चरण में 40 प्रतिशत शहरी आवादी तथा अंतिम चरण में शहरी 50 प्रतिशत आवादी लाभान्वित होगी।

यह पूछे जाने कि बीपीएल परिवारों की गणना किस आधार पर की जाएगी। जाधव ने कहा कि पूरे देश में 8 करोड से ज्यादा बीपीएल परिवार है जबकि वास्तविकता में 13 करोड से अधिक लोगों के पास बीपीएल कार्ड है।

उन्होंने कहा कि इससे कुछ हकदार लोग छूट गए हैं तो कुछ गैर-हकदार जुड भी गए हैं। लेकिन हम 2004 के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आधार पर बीपीएल परिवारों की गिनती करेंगे और इस आकलन में तेंदुलकर समिति की दृष्टि की भी मदद ली जाएगी।
 
उन्होंने कहा कि गैर बीपीएल परिवारों में ग्रामीण इलाके की 44 प्रतिशत तथा शहरी इलाके की 22 प्रतिशत जनता 20 किलोग्राम प्रतिमाह यानी प्रति व्यक्ति चार किलोग्राम अनाज मिलेगा पर जो न्यूनतम समर्थन मूल्य की आधी कीमत से अधिक नहीं होगा।
 
उन्होंने कहा कि सलाहकार परिषद ने पहले चरण में 85 प्रतिशत ग्रामीण आबादी तथा 40 प्रतिशत शहरी आबादी को अनाज मुहैया कराने की सिफारिश की है और पूरी योजना पूरे हिस्से में 31 मार्च 2014 तक लागू हो जाएगी।
 
उन्होंने बताया कि सलाहकार परिषद ने इस कानून से बच्चों तथा गर्भवती महिलाओं तथा प्रसूता महिलाओं एवं मिड डे स्कूल के बच्चों तथा अनाज एवं कमजोर वंचित ग्रुप के लोगों को भी कानूनी रुप से अनाज सस्ते दर पर पाने का अधिकार मिल जाएगा।

जाधव ने बताया कि बैठक में सार्वजनिक प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त बनाने का भी निर्णय लिया गया है। इस के तहत अनाज को भंडारण तथा खरीद को विकेंद्रीकृत किया जाएगा। तथा राशन की दुकानों की शाखाओं के निजीकरण को खत्म किया जाएगा एवं पीडीपएस कमिशनों की समीक्षा की जाएगी तथा पीडीएस का कम्प्यूटीकरण किया जाएगा एवं सभी दस्तावेजों में पूरी पारदर्शिता लाई जाएगी एवं स्मार्ट कार्ड तथा बायोमेट्रिक प्रणाली भी लागू की जाएगी।

उन्होंने बताया कि विधेयक के मसौदे को अंतिम रुप सलाहकार परिषद का वर्किंग ग्रुप करेगा। उन्होंने बताया कि बैठक में सर पर मैला ढोने की शर्मनाक प्रथा को ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक खत्म करने के लिए केन्द्र को भी राज्यों में समन्वय करने को कहा गया है।
 
उन्होंने कहा कि 1993 में संसद ने मैला ढोने वाले के रोजगार एवं खुला शौच निर्माण (प्रतिबंध) कानून पारित किया था पर पिछले सतरह साल में इस कानून के तहत अभी तक किसी को दंडित नहीं किया गया। इसलिए इस कानून के क्रियान्वन की हर तीन महीने पर निगरानी की जाएगी और यह प्रथा खत्म कर दी जाएगी।

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