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चूंकि प्यार है सदा के लिए करवा चौथ

यों तो हमारे सभी व्रत-त्योहार प्रेम और सद्भाव बढ़ाने के भाव से होते हैं, लेकिन करवा चौथ ऐसा व्रत है जो पति-पत्नी के प्रेम और स्पंदन को नई ताजगी-मजबूती से चार्ज कर देता है। समय के साथ इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ती गई है और इस धुर कारपोरेट युग में जब परिवार बनने से पहले ही टूटने के कगार पर पहुंचने लगे हैं, यह व्रत कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। शायद इसीलिए पूरे उत्साह और उत्सवधर्मिता के साथ मनाया जा रहा है।

साल के बारह महीनों के कृष्ण शुक्ल पक्षों में कुल मिलाकर चौबीस गणेश चौथ होती हैं। इनमें कार्तिक बदी चौथ करवा चौथ और माघ बदी चौथ संकट चौथ कहलाती है।

नाम में क्या खास
हम जानते हैं कि हमारे सारे पर्व कुछ न कुछ ज्योतिषीय आधार लिए होते हैं। इनके नाम भी अपने भीतर कुछ खास समेटे होते हैं। राशि चक्र के चार खास बिन्दुओं या मोड़ों पर जब हमारी धरती आती है तो उन काल खण्डों को खास पर्व माना जाता है। उत्तरायण यानी मकर संक्रान्ति के पास संकट चौथ, मीनान्त या बैसाखी के पास दमनक चौथ या गण गौर, कर्क सिंह के पास हरियाली तीज और गणेश जयन्ती चौथ, तुला संक्रान्ति के पास करक या करवा चौथ होती है। इन सबमें गणेश जी का व्रत, पूजा, बड़ों का सम्मान और प्रत्यक्ष देवता चांद, सूरज, हवा, जल आदि विश्वेदेवों को नमस्कार करने का बड़ा महत्व है।

सुहाग रक्षा से ताल्लुक!
वास्तव में गणेश को महाभारत के एक सन्दर्भ में सीधे शिव पार्वती का संयुक्त रूप ही कहा है जो सही भी है। कारण, आप शिव पार्वती के पुत्र हैं। सभी जीवगणों, देवगणों के ईश होने से आपका सर्वदेवमय गणेश नाम सार्थक है। अनादि काल से चले आ रहे स्त्री पुरुष के आपसी रिश्ते को स्थाई और कल्याणकारक बनाने के लिए ब्याह-शादी के वक्त शिव-पार्वती की तरह दो जीव एक देह या अर्धनारीश्वर स्वरूप होने का आशीष देने की हमारी परम्परा रही है। इन्हीं का संयुक्त रूप होने से गणेश चौथ खुद ही सुहाग या पति के लम्बे, स्वस्थ और सुखी जीवन से जुड़ जाती है।

व्रत की सार्थकता
आदित्य यानी आसमान में चलते-फिरते घूमते देवताओं में सूर्यदेव सबसे प्रधान हैं। ‘अन्नं वै प्राणा:’ कहकर उपनिषद् यही घोषणा करते हैं कि जिस अन्न में मनुष्यों के प्राण बसते हैं, वह सूर्य से पैदा होता है। कारण, सूर्य से ही मौसम में बदलाव, सर्दी-गर्मी-बरसात का सन्तुलन और फसलें होती हैं। इसी सूर्य के साथ सब पूजा मन्त्रों में ‘अग्निर्देवता वातो देवता: सूर्यो देवताश्चन्द्रमा देवतावसवो देवता रुद्रा देवता..’ कहकर अन्त में ‘विश्वेदेवा देवता:’ कहा।
सूरज, चांद, हवा, पानी आदि आकाशचारी सब देव मिलकर विश्वे- सारे देव- देवता कहलाए। ये हमारी जीवनधारा, नब्ज़ होने से हमारे हितकारी हैं और हम इनके कर्जदार हैं। कहा गया है कि हर पैदा होने वाले पर इन सब देवताओं के उपकार का ऋण है। अत: आग, पानी, हवा आदि को शुद्ध रखना, इनका दुरुपयोग न करना, इन पर अपना कब्जा जमाने की धौंस न देना या इनका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करके आने वाली पीढ़ियों के लिए मुश्किल-मशक्कत का माहौल बनाना पर्यावरण हितकारी न होने से पाप का कारण बनता है और हमारे हर पाप का भुगतान कुदरत हमसे लेती ही है। अत: विश्वेदेव की अवधारणा आखिरकार पर्यावरण रक्षा ही व्रत का मूल और आधारशिला है।

एक मनावें सब मनैं
वैदिक साहित्य में वर्णित बारह सूर्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु और दो अश्विनीकुमार मिलकर तैंतीस देवता माने जाते हैं। ये ही मुख्य देवगण कहे गए हैं।
यदि और गहराई में चलें तो दस विश्वेदेव, छत्तीस तुषित, चौसठ आभास्वर, उनचास वायु और दो सौ बीस महाराजिक मिलकर कुल चार सौ बारह गण यानी समूहदेवताओं के स्वामी गणेश हैं। अत: एक गणेश पूजन से इन सबकी पूजा-मनौती एक साथ ही हो जाती है।
जटाधर का कथन है कि दु:ख, दरिद्रता, कष्ट का निवारण, विजय, सामने खड़ी मुसीबत, रोग से रक्षा के लिए गणेश जी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करनी चाहिए।

पत्नी ही क्यों
किसी संस्था, परिवार या समुदाय को सबसे ज्यादा नुकसान चुगलखोरों या इधर की बात उधर करने वालों, या किसी की छुपे तौर पर हानि करके पीठ पीछे चुस्की लेने वालों से ही होता है। ये चूहों की तरह जड़ों को भीतर ही भीतर कुतरते हैं। अत: इन सबको संभालकर घर-परिवार को थामे, ऐसी नकारात्मक शक्तियों पर अंकुश लगाने का दम घर के मुखिया को व्रती यानी अनुशासित घरनी, पत्नी से ही तो मिलता है। वही तो घर को संभालती है। जब वही अनुशासनहीन, व्रत त्याग-तपस्या से रहित, आपसी प्यार-लगाव और समन्वय के भाव से परे बेलगाम हो तो जड़ों को खाने वाले चूहों को घर धड़ाम से गिराने का भरपूर मौका मिलता है। अत: सुलझी पत्नी ही सुखी परिवार की जड़ है।

व्रती पत्नी की भूमिका
समझदार पत्नी घर-परिवार के सदस्यों के विपरीत ध्रुवों में भी अपनी बुद्घि से तालमेल बना सकती है। यदि वह पति यानी घर के बाहरी मामलों को संभालने वाले पति को सकारात्मक ऊर्जा देती रहे, उसे घरेलू झंझटों से मुक्त रखे, तो घर में सुख समृद्धि बढ़ती है। मुद मंगलमय वातावरण, उससे मनस्तोष, तब आपसी प्यार, यानी सौभाग्य तो खुद-ब-खुद ही बढ़ेगा। इसी लिए सुहाग के सारे त्यौहारों को तीज चौथ के साथ ही जोड़ा गया है।
एक जगह पर बड़े मजेदार तरीके से विरोधी गुण धर्मों के स्वादिष्ट कॉकटेल का जायका मिलता है। शिवजी के गले का सांप गणेश के चूहे को, कार्तिकेय का मोर चूहे और सांप को, पार्वती का शेर शिवजी के नन्दी बैल को निगल जाने को उद्यत है। उधर शिव के सिर चढ़ी शशिकला से गंगा को सौतिया डाह है।
कहीं कुंवारे मलयस्वामी सुदर्शन कार्तिकेय, दांत टूटे गणेश की दो-दो पत्नियों के कारण हताश हैं। पार्वती जी अपनी समझ से इन सबको एक सूत में बांधे रखकर ही तो परिवार के मुखिया शिवजी को इस सारे जहर का कड़वा घूंट गले में ही समेटे समाधि में लीन रहने देती हैं या आगन्तुक देवों की बैठकों में ही व्यस्त हो बाहरी काम निबटाने की शक्ति देती है। उन्हीं की शक्ति से वे शक्तिमान् हैं।

करवा नाम क्यों?
करक संस्कृत शब्द का अर्थ हिन्दी में करवा यानी अर्घ्यपात्र है। करक में साक्षात् देव चन्द्र को अघ्र्य देने के लिए निहित जल रखने के कारण आम जनता मे इसे करक चतुर्थी और साधारण हिन्दी में करवा चौथ नाम से पुकारते हैं।
सिन्दूर गणेशजी का गहना है, अत: सुहाग की निशानी माना गया है। इनके सिर पर बाल चन्द्रमा है, अत: उगते चांद को अर्घ्य देकर व्रत खोलने का नियम है। अत: हो सके तो करवे में भी लाल फूल, चावल, सिन्दूर, तीर्थजल और दूब घास डालें। अर्घ्य देकर आप अपने प्राणनाथ, पति परमेश्वर, शरीके हयात, जानू, हबी वगैरह के प्रति अपना प्यार कैसे जताएं, इसमें भला हमारी सलाह की क्या जरूरत है?

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