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वाल्मीकि की वाणी को काव्य दिया क्रौंच वध की घटना-ने

वाल्मीकि ने नई भाषा नए छंद, नए कथ्य, नए अंदाज और भाव भूमि के साथ पहला महाकाव्य रामायण लिखकर आदि कवि होने का गौरव पाया। रामायण और महाभारत हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। रामायण में जो परिचय हमें वाल्मीकि का मिलता है वह उस मुनि का है जिनका आश्रय गंगा के निकट बहने वाली नदी तमसा के किनारे पर था और जहां वे अपने शिष्यों के साथ एक श्रेष्ठ करुणापूर्ण हृदय वाले साधु व्यक्ति के रूप में जीवन बिताते थे।
परम्परा वाल्मीकि को कुलपति कहती है और कुलपति का स्थान सिर्फ उसी शिक्षक को मिलता था जिसके आश्रम में शिष्यों के आवास, भोजन, वस्त्र, शिक्षा आदि का प्रबंध हो। वाल्मीकि राम के समकालीन थे और उन्होंने रामायण तब लिखी, जब रावण-वध के बाद राम का राज्याभिषेक हो चुका था। रामायण में सात काण्ड हैं और रामकथा की वास्तविक शुरुआत बालकांड के पांचवें सर्ग से होती है। पहले के चार सर्ग भूमि का के मरूप में  हैं, दिनमें वाल्मीकि के जीवन की घटनाएं काव्य में बांध दी गई हैं।
एक दिन सुबह गंगा के पास बहने वाली तमसा नदी के एक अत्यंत निर्मल जल वाले तीर्थ पर मुनि वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज के साथ स्नान के लिए गए। तब वहां नदी के किनारे पेड़ पर क्रौंच पक्षी का एक जोड़ा अपने में मग्न था। तभी व्याध ने इस जोड़े में से नर क्रौंच को अपने बाण से मार गिराया। रोती हुई मादा क्रौंच भयानक विलाप करने लगी तो करुणा के महासागर वाल्मीकि का हृदय इतना द्रवित हुआ कि उनके मुख से अचानक श्लोक फूट पड़ा-
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शास्वती समा।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्।।
शोक के अभिभूत उनके हृदय से यह क्या फूट पड़ा? उनका शिष्य पटु था। गुरु वाल्मीकि ने जब उससे कहा कि यह जो मेरे शोकाकुल हृदय से फूट पड़ा है, उसमें चार चरण हैं, हर चरण में अक्षर बराबर संख्या में हैं, और इनमें मानो तंत्री की लय गूंज रही है, अत: यह श्लोक के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता।
पादबद्धोक्षरसम: तन्त्रीलयसमन्वित:।
शोकार्तस्य प्रवृत्ते मे श्लोको भवतु नान्यथा।।
करुणा में से काव्य का उदय हो चुका था जो वैदिक काव्य की शैली, भाषा और भाव से एकदम अलग था, नया था और इसीलिए वाल्मीकि को ब्रह्मा का आशीर्वाद मिला कि तुमने काव्य रचा है, तुम आदिकवि हो, अपनी इसी श्लोक शैली में रामकथा लिखना, जो तब तक दुनिया में रहेगी जब तक पहाड़ और नदियां रहेंगे-
यावत् स्थास्यन्ति गिरय: लरितश्च महीतले।
तावद्रामायणकथा सोकेषु प्रचरिष्यति।।
वाल्मीकि के जीवन में दूसरी महत्वपूर्ण घटना तब घटी जब वे अपनी ओर से रामायण की रचना पूरी कर चुके थे। राम द्वारा परित्यक्ता, गर्भिणी सीता भटकती हुई उनके आश्रम में आ पहुंची तो मानो वाल्मीकि के पितृ हृदय में एक भूकम्प-सा आ गया। बेटी की तरह सीता को उन्होंने अपने आश्रय में रखा। वहां सीता ने दो जुड़वां बेटों, लव और कुश को जन्म दिया। दोनों बच्चों को वाल्मीकि ने हर तरह की शिक्षा-दीक्षा प्रदान की वहीं रहकर बच्चों ने अस्त्र विद्या पाई। इन्हीं बच्चों को मुनि ने अपनी रामकथा याद कराई जो उन्होंने सीता के आने के बाद फिर से लिखनी शुरू की थी और उसे नाम दिया-उत्तरकांड। उसी रामकथा को कुश और लव ने राम के दरबार में अश्वमेघ यज्ञ के अवसर पर सम्पूर्ण रूप से सुनाया था। यहां से हमारे देश में कुशीलव गायकों की परम्परा का सूत्रपात हुआ। सारी कथा सुनने के बाद राम ने सोचा कि अगर वाल्मीकि भरी सभा में आकर सीता को निष्कलंक घोषित कर दें तो सारा संकट ही खत्म हो जाए। वाल्मीकि आए, उन्होंने भरी सभा में सीता की निष्कलंकता की घोषणा की।
राम ने कहा कि वे तो प्रारम्भ से ही ऐसा मानते रहे हैं। सीता को लाया गया। उन्होंने पृथ्वी से अनुरोध किया और पृथ्वी ने सीता को अपने में समा लिया।
वाल्मीकि के जीवन की वह कैसी घटना रही होगी? क्रौंच वध की घटना ने उनकी वाणी को काव्य का रूप दे दिया। तो सीता के पृथ्वी प्रवेश के बाद कवि अवाक् हो गए। आदि कवि के चरणों में शत-शत नमन।

 

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