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कॉमनवेल्थ गेम्स का पोस्टमॉर्टम

अब कॉमनवेल्थ खेल खत्म हो गए हैं। शहर को छोड़ कर चले गए मणिशंकर अय्यर जैसे लोग वापस आ गए हैं। इन खेलों को कराने वालों के खिलाफ फिर से मुहिम छेड़ने वे चले आए हैं। एक मायने में मैं मणिशंकर से सहमत हूं। आखिर जो देश अपने लोगों को खाना मुहैया नहीं करा पाता। रहने को जगह नहीं दे पाता, उसे खेलों पर हजारों करोड़ रुपये फूंकने की क्या जरूरत थी?
लेकिन मुझे खुशी है कि अपने लड़के-लड़कियों ने खूब सोना, चांदी बटोरा। कुल मिलाकर हमारे मेहमानों ने मेजबानी का लुत्फ उठाया। ‘मेल टुडे’ की एक खबर के मुताबिक खेल गांव की सीवेज लाइन जाम हो गई। वजह थी इस्तेमाल किए हुए कंडोम। पानी का बहाव ठीक करने के लिए उन्हें निकालना पड़ा। देशी और विदेशी औरतों ने जम कर पैसे कमाए।
खेलों के उद्घाटन और समापन समारोह ने लोगों का दिल जीत लिया। मैंने इतना भव्य आयोजन देखा ही नहीं था। कितनी खूबसूरती और नजाकत से उसे तैयार किया गया था। मेरा मानना है कि जिन लोगों ने वह कार्यक्रम बनाया था, उन्हें हीरे जड़े सोने के तमगे दिए जाने चाहिए। एक दिन यों ही मुझे पता चला कि उन नृतकों और आदिवासियों के कॉस्टय़ूम किसने डिजाइन किए थे? वह सीरत नरेंद्र थीं। एक्टर कबीर बेदी की बहन। सीरत का जन्म 1977 में मिलान में हुआ था। उन्होंने कई साल इटली में गुजारे थे। मिलान यूनिवर्सिटी में उन्होंने पढ़ाई-लिखाई की। उसमें ड्रेस डिजाइनिंग में डिप्लोमा भी था। उन्होंने कमाल के कॉस्टय़ूम डिजाइन किए।
मैं उससे पहली बार तब मिला था, जब बीपीएल बेदी आखिरी बार दिल्ली आए थे। वह कबीर बेदी के पिता हैं। वह इटली वापस जाने से पहले कव्वाली सुनना चाहते थे। उन्होंने सीरत से कहा था कि वह मुझे और ज्ञानी जैल सिंह को भी वहां बुलाए। मैं तो सीरत की खूबसूरती पर फिदा हो गया था। उस आखिरी मीटिंग में मैंने उससे पूछा था कि इतनी खूबसूरत होने के बावजूद शादी क्यों नहीं की? उसने अजीब सा घूरते हुए जवाब दिया था, ‘मैंने तो अपने काम से शादी कर ली है।’
मैं समझ गया था कि वह मुझसे क्या कहना चाहती हैं, अपना काम करो और मेरी जिंदगी में दखल मत दो।

जन्मदिन मुबारक
मेरी पड़ोसी रीतादेवी वर्मा जन्मदिन मनाने में माहिर हैं। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा, ‘मैं उसी साल और दिन में पैदा हुई थी, जिसमें अमिताभ बच्चन हुए थे। यानी 11 अक्टूबर, 1942। हम तो लिब्रा यानी तुला हैं। लेकिन देखिए वह किस ऊंचाई पर हैं। और मैं कहां जमीन पर।’
यह सही है कि दोनों का करियर बिल्कुल ही अलग है। वह उत्तर प्रदेशी हैं हिंदू-सिख माता-पिता की संतान। ये असमी बंगाली हैं और अपना धर्म हिंदू-बौद्ध-ओशो बताती हैं। अमिताभ अपना जन्मदिन बड़े जोर-शोर से मनाते हैं। फिर उनका जन्मदिन उनके चहेते भी तो मनाते हैं। वह हर रोज करोड़ों रुपये कमाते हैं। लेकिन ये कुछ नहीं कमातीं महज भलाई के। वह तो अमीरों के अमीर हैं। और ये तो सबसे मांगती ही फिरती हैं। कोई जन्मदिन की पार्टी नहीं देतीं। बस, उस दिन मेरे घर आती हैं। अपने साथ छह-सात गली के कुत्तों को ले आती हैं। मेरी सिंगलमार्ट पीती हैं। मैं उनके कुत्तों को कबाब खिलाता हूं। मैं जन्मदिन का तोहफा देता हूं। वह मजे में ले लेती हैं।
जब मैं उनसे पहली बार मिला था तब वह कमाल की खूबसूरत थीं। यह 20 साल पहले की बात है। मैं नहीं जानता था कि वह मेरे पड़ोस में ही रहती हैं। उनके पति भीमदेव वर्मा महारानी गायत्री देवी के भतीजे थे। उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ कर गली के कुत्तों को खिलाना-पिलाना शुरू कर दिया था। उनके मरने के बाद अब रीता वही काम कर रही हैं। मेनका गांधी की वजह से उन्हें सरकारी सहायता मिल गई थी। तब मेनका केंद्र सरकार में मंत्री थीं। बाद में उन्हें एक और पैट्रन मिले कपिल सिब्बल। उन्होंने रीता देवी को एक मोबाइल क्लीनिक दिलवाई। दवाएं खरीदने और डॉक्टरों का भी पैसा दिया। इसी तरह ऐल्टन जॉन ने उनके लिए दूसरी मोबाइल क्लीनिक का इंतजाम किया। रीता देवी की सुबह 6:30 बजे शुरू होती है। शाम 6:30 बजे तक वह झुग्गियों में गरीबों का इलाज करती रहती हैं। वह कभी-कभी शाम को घर चली आती हैं। एक दिन चहकते हुए उन्होंने मुझे बताया, ‘आज हमने 560 मरीजों को देखा।’ वह दूसरों की सेवा में लगी हैं। इसीलिए शायद मैं उनका जन्मदिन अपने घर में मनाता हूं।

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