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नस्लवादी सजा

ग्रेट ब्रिटेन के उच्च सदन हाउस ऑफ लॉर्डस से लॉर्ड स्वराज पॉल और दो अन्य सदस्यों का निलंबन इतनी बड़ी खबर नहीं बनता अगर ये तीनों सदस्य एशियाई मूल के नहीं होते। हालांकि निलंबन का समर्थन करने वालों ने इस बात से इंकार किया है कि इस मामले में कोई नस्लवादी पक्षपात हुआ है लेकिन कम से कम एक और एशियाई सदस्य ने यह कहा है कि इसमें नस्लवादी भावना दिखाई देती है। दरअसल इस मामले के पीछे पिछले दिनों ब्रिटेन में सबसे चर्चित राजनैतिक घोटाला है। यह पाया गया कि कई संसद सदस्यों ने भत्ते पाने के लिए संसद में गलत जानकारी दी। सबसे ज्यादा जो गड़बड़ी पाई गई वह आवास से संबंधित थी। जो सांसद लंदन से बाहर रहते हैं उन्हें संसद के सत्र के दौरान लंदन में रहने के लिए भत्ते मिलते हैं। कई सांसदों ने, जिनके आवास लंदन में थे, यह जानकारी दी कि उनके घर लंदन से बाहर हैं और इस आधार पर भत्ते वसूले। यह किस्सा कई साल तक चला और जब उजागर हुआ तो यह पाया गया कि इसमें सभी राजनैतिक दलों के लोग थे। इस मामले के सामने आने पर सांसदों ने माफी मांगी और भत्तों की रकम लौटा दी। हालांकि जांच समिति ने माना कि स्वराज पॉल ने बेईमानी या बदनीयती से ऐसा नहीं किया और समिति ने उन्हें सिर्फ गैरजिम्मेदारी और लापरवाही का दोषी पाया, लेकिन उन्हें चार महीने के लिए निलंबित कर दिया। बाकी दो निलंबित सदस्यों में एक अमीर अली भाटिया हैं और एक महिला मंजिला पॉला उद्दीन हैं जो कि बांग्लादेशी मूल की हैं। लगभग बीस सदस्यों के खिलाफ शिकायत की गई थी और इन तीनों एशियाई मूल के सदस्यों को छोड़कर सभी को माफी मांगने पर छोड़ दिया गया। इन तीन को ही निशाना बनाए जाने से नस्लवाद का आरोप सामने आया है।
स्वराज पॉल के खिलाफ तर्क यह दिया गया कि चूंकि वे काफी अमीर हैं, इसलिए अगर वे भत्तों के लिए कुछ गड़बड़ी करते हैं तो वह अक्षम्य है, लेकिन ब्रिटेन का ऊपरी सदन परंपरागत रूप से समृद्ध लोगों का ही सदन है जहां के सदस्य लॉर्डस और महिला सदस्य बैरोनेस कहलाते हैं। पहले यहां सिर्फ कुलीन लोग ही आ सकते थे फिर उसमें ऐसे लोग भी आने लगे जिन्होंने किसी विशेष उपलब्धि या समृद्धि के आधार पर अभिजात्य वर्ग में जगह बनाई है। आम लोगों के लिए तो निचला सदन है जिसे ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ ही कहा जाता है और जहां बाकायदा आम चुनाव लड़ कर आना होता है। दरअसल ब्रिटेन अब काफी बहुलता वाला समाज हो गया है लेकिन विभिन्न वर्णो, नस्लों के लोगों के प्रति कुछ दुराग्रह वहां मौजूद हैं, बल्कि एशियाई लोगों की तरक्की की वजह से मूल अंग्रेजों में कुछ ईर्ष्याभाव भी है। यूरोप का समाज लंबे वक्त तक एक ही किस्म के लोगों का समाज रहा है और आधुनिक काल में आप्रवासियों की बड़े पैमाने पर आवाजाही की वजह से वह असहज महसूस कर रहा है। स्विट्जरलैंड में मस्जिद की मीनारें बनाने पर रोक या फ्रांस में बुर्के पर पाबंदी यूरोपीय लोगों के दूसरी संस्कृतियों के साथ तालमेल न बना पाने के ही लक्षण हैं। जाहिर है इस घटना को आम गोरे अंग्रेज नागरिक जैसा देखेंगे उससे ग्रेट ब्रिटेन के एशियाई लोगों की प्रतिक्रिया उलटी होगी। इससे दोनों समूहों के बीच दरार थोड़ी ज्यादा चौड़ी हो जाएगी, यह अच्छी बात नहीं है।

 

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