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अफसर, नेता और चहुमुखी विकास

भारत की 70 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में बसती है और दूसरी तरफ हमारी केन्द्र सरकार मुंबई को लंदन, दिल्ली को न्यूयार्क बनाने में लगी है। भौगोलिक विषमता विश्व के किस देश में नहीं है, लेकिन वहां की राजनीतिक समता ने इस पर फतह हासिल कर ली है। हमारे इस एकतरफा विकास तथा देश में भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, गरीबी, भूखमरी और कुपोषण के लिए हमारे नेता व अफसर जिम्मेदार हैं। क्योंकि नेताओं और उनके परिजनों के ऊपर न कोई नियम लागू होता है न कोई कानून। अगर हमारे नेता और अफसर देश के बारे में सोंचते तो पलायनवाद तो उपजा ही नहीं होता। न जाने कितनी पंचवर्षीय योजनाएं बीत गई, लेकिन सरकार का एक ही लक्ष्य है हम गांव-गांव तक सड़क, बिजली, पानी पहुंचायेंगे, लेकिन गांव आज भी जैसे पहले थे, वैसे ही हैं। आज हमारे गांव निजर्न होते जा रहे हैं और भीड़ शहरों की ओर रुख कर रहा है, इससे भूखमरी, गरीबी और जनसंख्या वृद्धि होना स्वाभाविक है।
हरीश सिंह, नैनीताल

दोषी ठहराना जायज नहीं
राज्य सरकारों और जनता द्वारा केन्द्र सरकार को हर बात पर दोषी ठहराना सामान्य सी बात हो गयी है। अनियमित विकास, निर्माण, भूस्खलन और प्राकृतिक आपदायें केन्द्र से पूछ कर नहीं आती। वरुणावत के लिए केन्द्र से करोड़ों रुपया आया, सरकार ने क्या किया? आपदा के नाम पर चंद लोगों की जेबें भरती है, वर्ना भूस्खलन से हुई क्षति को दोबारा कैसे ठीक किया जा सकता है। केन्द्र से झूठ बोलकर, हल्ला मचाकर हर मौके पर मांग करना, कर्मचारियों, अधिकारियों को मजबूर करना, प्रेस का हल्ला मचाना ऐसा लगता है कि कोई लूट मची है। जो जितना भूखा-नंगा अपने को बता सके वह उतना ही लूट ले। वरना मैदानी इलाकों में बाढ़ ने ज्यादा तबाही मचाई है। पर वहां पर इतनी हाय-तौबा नहीं मची। पिछले वर्ष बिहार में कोसी की बाढ़ में केन्द्र सरकार ने इतनी धनराशि नहीं दी, जितनी अब 13 जिलों और 1 करोड़ की आबादी वाला उत्तराखण्ड मांग रहा है, जहां अन्न की आपूर्ति बाहरी राज्यों से ही होती है। केन्द्र सरकार पहले से ही हिमालयी राज्यों को भारी धनराशि, विशेष राज्य के रूप में देती है, जोकि अन्य राज्यों की कमाई से आता है। अत: अधिकारियों द्वारा क्षति को बढ़ा-चढ़ाकर कर भेजना और जनता का अकारण केन्द्र सरकार को दोष देना निंदनीय है।
सुनील कुमार, हरिद्वार

लागू हो आरक्षण व्यवस्था
ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में 1700 पदों पर नियुक्तियां की गई, जिनमें आरक्षण नियम का उल्लंघन किया गया और विभागों जैसे शिक्षा विभाग में शिक्षामित्रों, शिक्षा आचार्य, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों, आशा वर्करों, आयुर्वेदिक आदि विभागों में आरक्षण नियम लागू नहीं किये जा रहे हैं। संविदा व आउटसोर्सिग से भरे जाने वाले पदों पर आरक्षण नियमों का पूरी तरह से पालन नहीं हो पा रहा है। संविदा से भरे जाने वाले पदों पर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का हक छीना जा रहा है। अत: संविदा व आउटसोर्सिग पदों पर आरक्षण व्यवस्था को लागू किया जाना चाहिए।
अनिल कुमार कोहली, बेतालघाट

स्वतंत्रता का अधिकार
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 में यह स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि सभी नागरिकों को जीने की स्वतंत्रता प्राप्त है। सभी को अपनी जिन्दगी अपने अनुसार जीने का अधिकार है, तो फिर ये ऑनर किलिंग क्यों? मां-बाप अपनी इज्जत और सम्मान के लिए अपने बच्चों की हत्या कर रहे हैं। विशेष तौर पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्य आज ऐसे राज्य बन चुके हैं जहां ऑनर किलिंग के सबसे ज्यादा मामले होते हैं। भारत में प्रतिवर्ष एक हजार से ज्यादा लोग ऑनर किलिंग के शिकार हो रहे हैं। सरकार को इस ऑनर किलिंग को रोकने के लिए ठोस कानून बनाने की अत्यन्त आवश्यकता है।
दीपक सिंह, देहरादून

भटकता मीडिया
भारतीय मीडिया सदैव ही विवादों में रहा है। वर्तमान में मीडिया की छवि टीआरपी, खबर बनाना व प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्तियों की पिछलग्गू वाली है, जिसमें 99 प्रतिशत सच्चाई है। खबर बनाकर बेचना हो या टीआरपी की रेस, इनमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में होड़ सी मची है। टीवी चैनलों के कैमरे किसी फिल्म का प्रोमो हो, या रिलीज या टीवी रियलिटी शो की चटपटी खबरें, किसी अभिनेता, नेता, क्रिकेटर की शादी की खबर सभी जगह मारा-मारी मची है। इसका जनमानस से व जमीनी हकीकतों से कोई नाता नहीं है, जोकि साबित हो चुका है। हाल ही में प्रदेश में आयी आपदा और सुमगढ़ बागेश्वर की घटना को राष्ट्रीय न्यूज चैनलों ने सिर्फ ब्रेकिंग न्यूज बनाया। किसी भी न्यूज चैनल ने गहराई तक खबर की छानबीन नहीं की। यह घटना उनके लिए एक न्यूज थी, वह भी ब्रेकिंग न्यूज। यदि स्थानीय टीवी चैनलों को छोड़ दें तो लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ के पास उन मासूमों की स्थिति, उनके घर-परिवार, स्कूल और साथियों की तकलीफ सहित मूलभूत समस्याओं से जूझते इन लोगों की खबरों के लिए या तो समय नहीं था या फिर रूचि नहीं थी। क्या छवि है हमारी मीडिया की आम जनमानस में, इस पर सोचने की जरूरत है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का चौथे पहरूए के कर्णधारों को सोचना होगा अपनी भूमिका के बारे में, वरना ऐसी पत्रकारिता का क्या फायदा, जो अंतिम व्यक्ति तक न पहुंच सके।
राजेश कोटवाल, अल्मोड़ा

 

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