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लोकतंत्र में लूट

सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिये हैं कि यदि अनाज को रखने के लिए गोदाम नहीं है तो खुले आसमान के नीचे उसे सड़ाने के बजाय गरीबों में मुफ्त बांद दें। एक तरफ कृषि मंत्रालय चाहता है कि कृषक हर फसल में अधिक पैदावार करें, ताकि अन्न की कमी न हो और देशवासियों को दो वक्त की रोटी मिल सके। किन्तु दूसरी ओर इसे रखने की व्यवस्था ही नहीं है। पुराना अनाज सड़ता रहता है, तब तक नई फसल तैयार हो जाती है। विडम्बना यह है कि अनाज ऐसे देश में सड़ रहा है, जहां लाखों लोग प्रतिदिन केवल भूख से मर जाते हैं। आज देश आन्तरिक एवं बाहरी दोनों समस्याओं से जूझ रहा है। माओवाद कुछ राज्यों में अपनी जड़े मजबूत कर चुका है, जम्मू-कश्मीर में झड़पें जारी है, अलगाववादी पूर्णत: हावी हो चुके हैं, भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। इन समस्याओं पर सदन में कोई चर्चा नहीं होती है। इसलिए आम जन का विश्वास अब लोकतंत्र से भी हटने लगा है, क्योंकि लोकतंत्र में भी लूट शुरू हो गयी है।
जी. सी. बमोला, देहरादून

अयोध्या विवाद की चाह
खुशवंत सिंह का लेख ‘और भी गम है जमाने में अयोध्या के सिवा’ पढ़कर लगता है कि खुशवंत सिंह, जिन्हें कि लेखन की दुनिया में एक स्तम्भ माना जाता है, अब वे बुढ़ापे की जिंदगी गुजार रहे हैं। पूरे देश के लोग जिनमें मुस्लिम समुदाय के कई धर्म गुरु व गणमान्य व्यक्ति भी शामिल हैं, वे चाह रहे हैं कि अयोध्या का मामला शांति व भाईचारे से सुलझ जाय। परन्तु खुशवंत सिंह, मुलायम सिंह और लालू यादव जैसे लोगों की कतार में खड़े होकर हिन्दू व मुसलमान दोनों धर्मों के लोगों को भड़काने का प्रयास कर रहे हैं। महत्वपूर्ण व अति सराहनीय बात तो यह है कि फैसले के बाद अमन-चैन बना रहा और किसी के बहकावे में आये बगैर दोनों धर्मो के लोगों व धर्म गुरुओं ने इस विवाद को शांति पूर्ण ढंग से हल करने का प्रयास किया। ऐसे समय फैसले पर विपरीत टिप्पणी करना, जन समुदाय को भड़काने का असफल प्रयास के साथ-साथ न्याय प्रणाली का अपमान भी है।
पीताम्बर दुदपुड़ी, कोटद्वार

पूर्व सैनिकों का भी हो ख्याल
आशा व्यक्त की जा रही है कि राज्य के आगामी स्थापना दिवस पर मिशन 2012 के मद्देनजर सरकार सभी वर्गों के लिए कुछ न कुछ घोषणाएं करेगी। देखना है इस अवसर पर भी सरकार को पूर्व सैनिकों की सुध आती है या नहीं। सैन्य बहुल उत्तराखण्ड में पूर्व सैनिकों एवं उनके परिवारों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। अपेक्षाकृत कम आयु में सेवानिवृत्त होकर बेरोजगार घर बैठे पूर्व सैनिक जहां सरकार से पुनर्वास की आस संजोए हैं, वहीं सरकार स्वयं नये-नये कानून बनाकर उनके पुनर्वास में अड़ंगे लगा रही है। इसका उदाहरण सरकारी सेवाओं में पूर्व सैनिकों के लिए अधिकतम आयु सीमा का प्रावधान है। हाल ही में एलटी ग्रेड शिक्षकों के लगभग 1400 पदों के लिए जारी विज्ञप्ति में पूर्व सैनिक उम्मीदवारों के लिए अधिकत आयु सीमा 40 वर्ष निर्धारित की गयी है। 20 वर्ष की आयु में भर्ती होकर 28 वर्ष की सामान्य सेवा के उपरान्त 48 वर्ष की आयु में सेवा निवृत्त जवान क्या अगले 12 वर्षो तक सरकारी सेवा के लिए अनफिट हो जाता है। कहीं यह पूर्व सैनिकों को पुनर्वास के अवसरों से वंचित करने की कोई सोंची समङी साजिश तो नहीं है। आशा है सरकार इस बिन्दु पर अविलम्ब कोई निर्णय लेगी। इसी के साथ-साथ किसी पद के लिए निर्धारित योग्यता रखने वाले पूर्व सैनिक आवेदकों को प्रवेश परीक्षा से छूट देकर सीधे साक्षात्कार के जरिए नियुक्ति दी जानी चाहिए।
श्याम कुमार त्यागी, रुड़की

आपदा और देवभूमि
उत्तराखंड में हर साल प्राकृतिक आपदा नये-नये कहर ढाती है, परन्तु इतना सब होने के बावजूद भी हमारे चुनिंदा अर्थशास्त्री बने सरकारी तंत्र की नजरें हमारे पहाड़ की अडिगता को हिलाने पर उतारू हैं। लगातार भारी बारूदी विस्फोटों के द्वारा सुरंगों में नदियों को डालने का कार्य जारी है। ऐसे में खिसकते गांव, पहाड़, जल, जंगल और जमीन हम पहाड़ियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी को छोड़ा जाता है। प्राकृतिक आपदा के हाथों में और खुद निर्माणकर्ता पक्की मजबूत कोठियों में सुरक्षित होकर चैन की नींद सोते हैं। अतिसंवेदनशील हमारे पहाड़ों में बारुदी सुरंगों को कुरेदने का कार्य बंद किया जाना चाहिए।
अश्विनी गौड़, अगस्त्यमुनि

जलवायु परिवर्तन
वर्तमान समय में मानव जाति ने हर क्षेत्र में विकास के नये आयाम स्थापित किये हैं। विज्ञान के उचित प्रयोग के कारण चिकित्सा, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में विकास हुआ है, लेकिन विकास की इस अंधी दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करके अपने आने वाले समय को विनाशकारी बना दिया है। प्रकृति का अनुचित दोहन करके मनुष्य ने अपने ही विनाश का रास्ता तैयार कर लिया है। प्रकृति ने मनुष्य को विभिन्न प्रकार के संसाधन उपलब्ध कराये हैं, लेकिन मानव ने प्रकृति को ही असंतुलित कर दिया है। प्रकृति जब विद्रोह करती है तो मानव सभ्यता तथा समाज का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन एक गंभीर मुद्दा बन गया है।
प्रेम राठौर, देहरादून

 

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