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विदेशी पुरस्कारों की अंधी उतावली

अरविंद अडिगा ने अक्टूबर 2008 में जब ‘द ह्वाइट टाइगर’ के लिए बुकर प्राइज जीता तो भारतीय मीडिया में काफी उत्साह था। प्रमख अंग्रेजी अखबार ‘द हिन्दू’ ने अपने मुख्यपृष्ठ की लीड खबर बनाया। सभी अखबारों में अदिगा की सूट-टाई पहनकर पुरस्कार लेते हुए फोटो छपी। (जैसे कि किसी अंग्रेज को अगर हम पुरस्कार दें तो उससे कहें कि वह शेरवानी या बंद गला पहने)। कुछ अखबारों ने इस ग्रेट विक्ट्री पर अपने संपादकीय लिखे। 

राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री ने बधाई संदेश भेजे और मेरी स्मृति में ऐसा आज तक नहीं हुआ जब किसी लेखक को साहित्य अकादमी पुरस्कार या ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए गए हों। पर उपन्यास के बारे में बहुत कम चर्चा हुई। किसी के लिए यह बात खास महत्व नहीं रखती थी कि अडिगा ने अपने उपन्यास में देश को क्रूर, नाइंसाफी व भ्रष्टाचार वाली जगह के रूप में चित्रित किया है और जो एकपक्षीय या अतिवादी विचार है।

मुद्दा यह नहीं है कि अडिगा को आलोचनात्मक रवैया नहीं अपनाना चाहिए। आलोचना तो वह चीज है, जो भारत की तरक्की में जरूरी है और इसे स्वीकार करना चाहिए। पर ज्यादातर भारतीयों के लिए हैरानी वाली बात यह हो सकती है कि किताब के स्वतंत्र मूल्यांकन के बगैर उसे अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान कर दिया गया।

विडंबना यह है कि किताब के बारे में व इसे पुरस्कृत करने पर इंग्लैंड में विचार हुआ। कई अखबारों ने इस प्रक्रिया की प्रशंसा की पर ‘गार्जियन’ का मत था कि यह बुनियादी रूप से एक बाहरी दुनिया का मत था और इसमें उथलापन भी काफी है।

‘टेलीग्राफ’ ने यह कहकर इसे बेकार बताया कि उपन्यास बॉलीवुड की पटकथा के पहले ड्राफ्ट जैसा है और हर चरित्र फॉर्मूले का शिकार है। भारत की मुख्यधारा के 99 प्रतिशत मीडिया ने ठीक वही बातें दोहराईं जो ब्रिटिश ज्यूरी ने पुस्तक के बारे में कही थीं। केवल मंजुला पद्मनाभन ने ‘आउटलुक’ में किताब की कड़ी आलोचना की थी और यह भी बुकर पुरस्कार मिलने से पहले।

कुछ ऐसा ही ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ के साथ भी हुआ। जब इसे इंग्लैंड में बेस्ट फिल्म का पुरस्कार मिला, तब तक फिल्म आधिकारिक तौर पर भारत में रिलीज भी नहीं हुई थी। ऐसे में ज्यादातर लोगों ने इसे देखा नहीं था और इसका मूल्यांकन नहीं कर सकते थे, पर फिर भी मीडिया इस उपलब्धि के ढोल पीटने में जुट गया।

जब फिल्म ने फरवरी सन् 2009 में ऑस्कर पुरस्कार जीता तब तो सारी सीमाएं तोड़ दी गईं। सारा माहौल हिस्टीरिया में बदल गया। इस जीत पर हैडलाइन बनने लगीं, संपादकीय में लिखा जाने लगा कि आखिरकार भारत अब बिग लीग में पहुंच गया है। कई दिनों तक चैनलों में यह खबर छाई रही। परिचर्चाओं में भारत की प्रतिभा को विश्व स्तर पर स्वीकार किए जाने पर बहस होती रही। कम ही लोगों का ध्यान फिल्म की गुणवत्ता पर गया और कम ही लोगों को याद रहा कि फिल्म भारतीय नहीं है।

फिल्म का निर्माता ब्रिटिश था और अवार्ड के लिए इसे ब्रिटिश फिल्म के तौर पर शामिल किया गया था। लॉर्ड मेघनाद देसाई ने कड़े लफ्जों में सार्वजनिक तौर पर कहा कि वह ऑस्कर पुरस्कार इसलिए जीत सकी क्योंकि फिल्म ब्रिटिश निर्देशक ने बनाई थी।

यह सही है कि फिल्म की टीम के कुछ भारतीयों जैसे एआर रहमान को संगीत, गुलजार को गीत व रसूल पूकुट्टी को संपादन के लिए ऑस्कर मिला। ज्यादातर लोग इसे मानेंगे कि रहमान एक प्रतिभावान संगीतकार हैं पर ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ में उनका संगीत सर्वोत्तम नहीं कहा जा सकता है। इसी तरह गुलजार की अनूठी प्रतिभा ‘जय हो’ गाने में नहीं झलकती, जिसने उन्हें ऑस्कर दिलाया।

पूरी फिल्म काफी मनोरंजक है, पर असाधारण कहीं से नहीं है। कुछ हिस्सों में इसकी कहानी में बचपना है और कई जगह भारत व भारतीय यथार्थ का चित्रण पश्चिमी स्टीरियोटाइप के मुताबिक है। पर ऑस्कर पुरस्कार ने इतना उत्साह व हलचल पैदा कर दी कि फिल्म की आलोचना अपने में देशभक्ति के खिलाफ समझे जाने लगी।

‘द ह्वाइट टाइगर’ की आलोचना पर भी कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया सामने आती रहीं। इनके मध्य समानता देखने पर कई चीजें स्पष्ट होती हैं। तथ्य यही है कि एक जैसी थीम व प्रस्तुति वाली फिल्म व उपन्यास ने कुछ ही महीनों के अंतर पर पश्चिमी पुरस्कार व प्रशंसा को हासिल किया। पिछली बार ऐसा सन् 1994 में ही हुआ था जब मिस यूनिवर्स के लिए सुष्मिता सेन व मिस वर्ल्ड के लिए ऐश्वर्या राय को चुना गया था।

यह वही दौर था जब भारत पश्चिमी देशों के लिए अपनी आर्थिक व्यवस्था का उदारीकरण कर रहा था। शायद ‘हनीमून’ पूरा हो चुका है और सन् 2008-09 में आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे भारत को दूसरा ही संदेश देना है जो कि अब पश्चिमी मुल्कों को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच रहा है।

साफ-साफ कहा जाए तो चाहे ऑस्कर हो या बुकर, इस तरह के विदेशी पुरस्कार व स्वीकृतियां भारत को खुद ही पीठ थपथपाने की मानसिकता का गुलाम बना देती हैं। इससे ऐसी बातों के पीछे छुपे सत्य को समझने में दिमाग के खुलेपन के साथ इस्तेमाल की क्षमता बिल्कुल थम जाती है। अदिगा के मामले में अंग्रेजी में कथा कहने की क्षमता को वास्तव में विदेशी पुरस्कार मिला है और उसे ही उपन्यास की साहित्यिकता व सार पर बहस की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बुकर जीतने का मतलब है सही लोगों से सम्मान पाना, ग्लैमर की दुनिया में आना जो कि अन्य चीजों से अधिक अहम है। पर जो चीजें पीछे छोड़ दी गई हैं उनके बारे में कौन बात करेगा। एक प्रमुख भारतीय प्रकाशक ने एक साक्षात्कार में कहा कि यदि किसी लेखक को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलता है तो उसकी कृति की ज्यादा से ज्यादा 10 प्रतियां अधिक बिक जाती हैं।

बुकर पुरस्कार की तर्ज वाले भारत के क्रॉसवर्ड प्राइज मिलने पर 100 प्रतियां अधिक बिकती हैं। पर किसी को बुकर मिलने पर उसकी कृति की बिक्री में अभूतपूर्व इजाफा होता है। 50 हजार से लेकर डेढ़ लाख प्रतियां तक बिक जाती हैं। भारत के बारे में लिखे उपन्यास को बुकर मिलने पर लोग इस उत्सुकता में उसे खरीदकर पढ़ते हैं कि आखिर ऐसा क्या है कि अंग्रेजों ने इसे सराहा है। दिलचस्प बात यह है कि ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ ने भारत में ज्यादा लाभ कमाया। फिल्म भारत पर बनी, भारत के विषय पर बनी लेकिन इसे पश्चिम में सराहा व पुरस्कृत किया गया और यही अपने में आह्लादित होने का विषय है।

(शीघ्र प्रकाशित होने वाली पुस्तक ‘भारतीयता की ओर’ का अंश)

लेखक भूटान में भारत के राजदूत हैं।

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