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कश्मीर : संजीदगी से निकलेगा हल

वादी-ए-कश्मीर में अब स्कूल-कॉलेज खुल चुके हैं और दहकती हुई घाटी में सर्द शीतल हवा के पुरसुकून झोंके बहने लगे हैं। ये हालात सिर्फ ऐसे कश्मीरी आवाम की पहल पर कायम हो सके हैं, जिनके बच्चों के स्कूल कॉलेज की पढाई-लिखाई महीनों से ठप थी, लेकिन बेहतर स्थिति के निर्माण के लिए उमर अब्दुल्ला हुकूमत का प्रयास किंचित भी कामयाब नहीं हो सका।

अब केंद्र ने अगला कदम उठाते हुए कश्मीर पर वार्ताकारों के एक दल का गठन किया है। यह दल एक वर्ष तक कश्मीर के विभिन्न संगठनों के साथ बातचीत करके कश्मीर समस्या का कोई सर्वमान्य हल निकालने की कोशिश करेगा। इस दल में प्रख्यात पत्रकार दिलीप पडगांवकर, जामिया मिल्लिया की प्रोफेसर राधा कुमार और पूर्व सूचना आयुक्त एमएम अंसारी को शामिल किया गया है। कभी जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर के लिए वार्ताकार के रूप में लाल बहादुर शास्त्री जैसे शख्स को नियुक्त किया था।

नरसिंह राव ने राजेश पायलट और जार्ज फर्नाडीज सरीखे असरदार राजनेताओं को कश्मीर मसले के हल के लिए वार्ताकार मुकर्रर किया था। इन मौकों पर कश्मीर के सवाल पर फौरी तौर पर सकारात्मक हल निकाले गए। अब जो वार्ताकार चुने गए गए हैं, वे पहले के मुकाबले राजनीतिक तौर पर ताकतवर नहीं हैं। उनको लेकर कश्मीर के लोग संजीदा नहीं दिखते।

इससे पहले भी सन् 2007 कश्मीर में स्वायत्तता के प्रश्न पर एक कोर कमेटी का गठन किया गया था, जिसकी जिम्मेदारी जस्टिस सगीर अहमद को दी गई थी। इस कमेटी में कश्मीर के ज्यादातर दलों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया, लेकिन प्रधानमंत्री की इस कोर कमेटी की केवल तीन बैठकें आयोजित की गईं और कमेटी किसी आम राय पर पहुंचने में नाकाम रही।

आखिर में जस्टिस सगीर अहमद ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपने के स्थान पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को सौंप दी, जिसे सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। कुछ समय पहले सासंदों का एक सर्वदलीय दल कश्मीर के दौरे पर गया था जिसने अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी थी। यह कोई सर्वसम्मत रिपोर्ट नहीं हो सकती थी, क्योंकि विभिन्न दलों की कश्मीर मसले पर अलग राय रही है। दलों के यही अंतरविरोध सांसदों की रिपोर्ट में भी थे।

फिलहाल मुद्दा इन मतभेदों का नहीं है, मुद्दा सरकार की गंभीरता का है। हद तो तब हो गई जब कश्मीर की स्थिति पर उमर अब्दुल्ला के एक खतरनाक और भटके हुए बयान का खंडन करने की जरूरत भी केंद्र सरकार ने नहीं समङी। कश्मीर में सेना से विशेष अधिकार छीनने के प्रश्न पर भी केंद्र सरकार ऊहापोह में है। सरकार के बड़े ओहदेदार इस तथ्य से भली भांति परिचित हैं कि कश्मीर को जेहादी आतंकवाद से निजात दिलाने का दुरूह कार्य भारतीय सेना के अफसरों और जवानों के असीम बलिदानों से ही मुमकिन हुआ है।

कश्मीर में कथित जेहाद अपनी आखिरी सांसें ले रहा है तो सिर्फ और सिर्फ सेना के कारण ही। कश्मीर के पृथकतावादी पेट्रो डॉलर के बलबूते पर अफरा-तफरी के हालत को पैदा करने की जोरदार कोशिश को अंजाम दे रहे हैं। ऐसे सभी तत्वों पर लगाम कसने पर नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस की साझा सरकार जीजान से नहीं जुटी। इन तत्वों को कश्मीरी नौजवानों को बरगलाने और पत्थरबाजी के लिए उत्तेजित करने का भरपूर अवसर दिया।

कई महीनों तक कश्मीर घाटी में कर्फ्यू लगा रहा। घाटी में ऐसा नजारा विगत दस वर्षो से कभी नहीं दिखाई दिया। गुलाम नबी आजाद की सरकार के अमरनाथ श्राइन को जमीन प्रदान करने के विरुद्ध हुए आंदोलन में भी ऐसे बदतर हालात पेश नहीं आए। कश्मीर ऐसा राज्य कदाचित नहीं है कि केंद्र सरकार कानून व्यवस्था का सारा मामला राज्य सरकार के जिम्मे छोड़कर निश्चिंत हो जाए। इस रवैये को तत्काल बदला जाना चाहिए।

दूसरी तरफ पाकिस्तान पर भरोसा करके चलना कश्मीर के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है। पाक अधिकृत कश्मीर में जेहादी आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों को बाकायदा आईएसआई संचालित कर रही है। ऐसे में अमेरिका की कूटनीति भारत के लिए छलावा सिद्ध हो सकती है। अफगान युद्ध के कारण अमेरिका के पास पाकिस्तान पर भरोसा करने और उसको सहयोगी बनाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है। वह पाकिस्तान की हिमायत के लिए विवश है।

जेहादी आतंकवादियों ने अभी कश्मीर में पराजय स्वीकार नहीं की है, वे एक और बड़े आक्रमण की जोरदार तैयारियों में जुटे हैं। केंद्रीय सरकार को अपने कश्मीर को संभालना है और संवारना है। संपूर्ण जम्मू-कश्मीर की तरक्की में, कश्मीरी नौजवानों के रोजगार में और कश्मीरी दस्तकारों की खुशहाली में तथा सरकारी अमले की ईमानदारी में ही जेहादी आतंकवाद की मुकम्मल शिकस्त निहित है। 

लेखक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं

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