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उम्मीद तो हो, लेकिन..

वह अपनी टीम के काम की रफ्तार से खुश नहीं थे। बोर्ड की मीटिंग में अपनी बात भी रखी थी। उस मीटिंग से निकलते हुए उनके बॉस ने कहा था, ‘अरे, अपनी रफ्तार से ज्यादा टीम को समझने की जरूरत होती है। जरा, फिर से सोचो।’ मशहूर फर्म वाइवो के मैनेजिंग डायरेक्टर माइकेल पैरिश का कहना है कि हमें अपनी उम्मीदों को किसी टीम पर नहीं थोपना चाहिए। हमें टीम और प्रोजेक्ट को देख कर उम्मीदें बांधनी चाहिए।

पैरिश एक व्यावहारिक सोच की बात कर रहे हैं। अक्सर टीम के कप्तान नाकामयाब इसलिए होते हैं कि वे अपनी उम्मीदों को ही आगे रखते हैं। वे न तो प्रोजेक्ट पर सोचते हैं और न ही टीम पर विचार कर पाते हैं। एक प्रोजेक्ट की अपनी संभावनाएं होती हैं।

उसी पर ठीक से सोचना जरूरी होता है। वह प्रोजेक्ट क्या है? उसमें कितनी संभावना है? उसके लिए क्या किया जा सकता है? वह कितनी दूर तक जाएगा वगैरह-वगैरह। उस प्रोजेक्ट के बाद टीम पर सोचना चाहिए। आखिर हमारी टीम किस हाल में है? उसकी खूबियां और खामियां क्या हैं? इसके अलावा यह भी देखना-जानना जरूरी होता है कि उस टीम से प्रोजेक्ट कितनी दूर तक जा सकता है। वह टीम उस काम को कितने वक्त में कर पाएगी? यानी अपनी टीम और प्रोजेक्ट का कायदे से जायजा लेना बेहद जरूरी है। उसके बिना बात बनती नहीं।

असल में किसी भी काम के तीन स्तर होते हैं। एक तो लीडर है। दूसरा टीम है और तीसरा प्रोजेक्ट है। इन तीनों में अगर तालमेल नहीं है, तो गड़बड़ी होनी ही है। कभी ये गड़बड़ लीडर की वजह से होती है। कभी टीम की वजह से और कभी प्रोजेक्ट ही आड़े आ जाता है। इन सब में तालमेल बिठाना लीडर का काम है। लीडर की एक उम्मीद होती है, लेकिन वह टीम और प्रोजेक्ट से अलग नहीं हो सकती।

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