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‘जमींदार’ जनक सिंह की भूख से मौत

दाने-दाने को मोहताज जनक सिंह (50 वर्ष) ने आखिर दम तोड़ दिया। परिजनों और पड़ोसियों के अनुसार जनक सिंह की मौत भूख से हुई है। वे लोहरदगा के सेन्हा प्रखंड के चितरी ग्राम निवासी जमींदार स्व. नंदकिशोर सिंह के पुत्र थे।

जनक सिंह की पत्नी गौरी सिंह देवी के पास महज दो डिसमिल जमीन पर बना एक कच्च मकान है। बारिश में यहां सिर छिपाना भी मुश्किल होता है। पिछले तीन दिन से गौरी के घर में चूल्हा नहीं जला है। गरीबी का आलम यह है कि उनके घर में मुट्ठी भर अनाज भी नहीं है। तीन पुत्रियों और दो पुत्रों समेत छह लोगों का पालन-पोषण कैसे होगा, यह यक्ष प्रश्न है।

गांव की सहिया शांति देवी ने बताया कि भूख से छह अक्तूबर को जब जनक सिंह की स्थिति खराब हुई थी तो उन्हें अपराह्न् तीन बजे लोहरदगा सदर अस्पताल में इलाज के लिए लाया गया था। यहां डॉक्टर ने एडमिट करने से मना कर दिया। 17 अक्तूबर को अंतत: उन्होंने दम तोड़ दिया। पड़ोसियों ने चंदा इकट्ठा कर जनक सिंह का अंतिम संस्कार किया।

इस संबंध में डीसी रतन कुमार ने कहा कि मामले की जांच के लिए सिविल एसडीओ जगत नारायण प्रसाद को निर्देश दिये गये हैं। साथ ही भूख से हुई मौत से उन्होंने साफ इंकार किया है। एसडीओ की पहल पर विधवा गौरी को 35 किलो खाद्यान्न दिया गया। सेन्हा अंचल के अधिकारियों को उन्हें पारिवारिक लाभ योजना के तहत भी राशि उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।

जनक सिंह की बड़ी बेटी मोहिनी सिंह (14वर्ष) पिता की मौत के बाद भी घर नहीं पहुंच सकी। वह राउरकेला में किसी के घर दाई का काम करती है। सोहिनी सिंह (12वर्ष), आदित्य सिंह (10 वर्ष), कामिनी (6 वर्ष) और अतुल सिंह (3 वर्ष) मां के साथ रहते हैं। बच्चों की भूख मिटाने के लिए मां गौरी प्रतिदिन 10 किमी. का फासला तय कर लोहरदगा शहर आती है। बर्तन मांजने के बाद उसे जो 35-40 रुपये मिलते हैं, उसी से वह परिवार चलाती है।

गौरी ने बताया कि जो छोटा भू-खंड बचा हुआ था, उसे ही बेचकर पांच साल पहले दो डिसमिल जमीन पर घर बनाया था। उसने कहा कि पिछले एक महीने से पड़ोसियों द्वारा जो कुछ मिलता था, उसे खाकर जनक जिंदा था।

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