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ब्लॉग वार्ता : दोस्त हो जब ऐसा

भारत की भूख अब विकराल रूप ले चुकी है। भूख पर लिखी जा रही पंक्तियों का शासन की संवेदनाओं पर कोई असर नहीं होता है। फिर कुछ लोग भूख को लेकर आवाज उठा रहे हैं। शिरीष खरे लिखते हैं कि भारत में कुपोषण अब गरीब अफ्रीकी देशों से भी बदतर है। 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी में कुपोषण और भूख की मात्रा बहुत है। फिर किस दलील से कोई पार्टी का कोई नेता कहता है कि हमने विकास किया है। इन्हीं सवालों से जूझते, टकराते समझाते एक ऐसे ब्लॉग पर हमारी नजर पड़ी है जो खुद को दोस्त कहता है। क्लिक कीजिएगा http://crykedost.blogspot.com।

शिरीष खरे इस ब्लॉग पर जम कर लिख रहे हैं। कहते हैं कि जानकार भूख के सवाल को तकनीकी मामलों में उलझा देना चाहते हैं। मगर यह सामाजिक और आर्थिक असमानता से भी गहराई से जुड़ा है। इस ब्लॉग पर आपको सारे लेख जरूरी ही लगेंगे। एक लेख में शिरीष लिखते हैं कि ग्यारह साल बाद में भारत में महानगरों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा हो जाएगी और हर महानगर में एक करोड़ से ज्यादा लोग रहने लगेंगे। भारत की जनगणना के मुताबिक पिछले एक दशक में दस करोड़ लोग गांव छोड़ कर जा चुके हैं। क्राई के इस ब्लॉग पर सामाजिक संस्था की तमाम रिपोर्ट हिन्दी में प्रस्तुत की गई हैं।

क्राई की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में 15 प्रतिशत लड़कियों की शादी 13 साल की उम्र में ही कर दी जाती है। इनमें से लगभग 52 प्रतिशत लड़कियां 15 से 19 साल की उम्र में गर्भवती हो जाती हैं। एक सर्वे में जयपुर के 50 प्रतिशत से अधिक पिताओं का कहना है कि अगर आर्थिक तंगी आती है तो वे सबसे पहले बेटियों का स्कूल जाना बंद करवा देंगे। इसमें ऐसे कईं मुद्दों पर विस्तार से लिखा गया है। शिरीष एक सवाल उठा रहे हैं कि खेतों में काम करना बाल मजदूरी क्यों नहीं है? कहते हैं कि तमाम नियमों के बाद भी हर बार जनगणना में बाल मजदूरों की तादाद पहले से कहीं ज्यादा क्यों निकल आया करती है?

इस सवाल के जवाब में शिरीष लिखते हैं कि देश में डेढ़ करोड़ से अधिक बाल मजदूर हैं। इनमें से 70 प्रतिशत खेती के कामों से जुड़े हैं। इसलिए जब तक खेती से जुड़े कामों को भी बाल मजदूरी मानकर उन पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा, तब तक बाल मजदूरी को जड़ सहित उखाड़ फेंकना संभव नहीं हो पाएगा। कहते हैं कि कानून में कई संशोधनों के बाद 16 व्यवसायों और 65 प्रक्रियाओं को भी खतरनाक कामों की सूची में शामिल किया गया। मगर इस सूची से खेती से जुड़े कई खतरनाक काम छूट ही गए।

दरअसल इस तरह के गंभीर मुद्दे संगठनों और सेमिनारों के दायरे तक ही सीमित होकर रह गए हैं। प्रिंट को छोड़ ऐसे मुद्दे में मीडिया की दिलचस्पी कम रही है। आम वोटर भी अपने राजनेताओं से इन मुद्दों पर सवाल नहीं पूछता।

बिहार में रैली हो रही है। किसी वोटर को नीतीश कुमार, लालू यादव और राहुल गांधी से इस तरह के सवालों पर राय पूछनी चाहिए। एक सामान्य आरोप लगाना तो आसान राजनीति है। ऐसे मुश्किल सवालों से अगर जनता नेता को घेर ले तभी राजनीति की धार तेज हो सकेगी। वर्ना यह सीधा सीधा कुर्सी बचाने और हथियाने का खेल बन कर रह जाएगा।

शिरीष का लेख शहर के भीतर कितने शहर पढ़ना चाहिए। कहते हैं कि अहमदाबाद, मुंबई और दिल्ली सबके मास्टर प्लान एक जैसे लगते हैं। इसके बाद भी शहरवासियों की दशा दुर्दशा में बदल रही है। कहते हैं कि किसी शहर की तरक्की की हकीकत को देखना हो तो वहां की झोपड़पट्टियों में जाना चाहिए। तभी पता चलेगा कि शहर की सुविधाओं में कितना सुधार आया है। किसी शहर को लंदन, न्यूयार्क या शंघाई बनाने की बातों से वहां का नजारा नहीं बदल जाएगा। आखिर ऐसा क्यों है कि मुंबई शहर का हर दूसरा आदमी झोपड़पट्टी में रहता है। फिर कैसे यह अमीरों का शहर कहलाता है।

ऐसा नहीं कि गरीब शहर की अर्थव्यवस्था में योगदान नहीं करते। शिरीष बताते हैं कि मुंबई में 66 लाख 16 हजार घरेलू मजदूर हैं, जिसमें से भी 3 करोड़ 76 हजार सीमांत मजदूर हैं। इन्हीं मजदूरों की बदौलत राज्य सरकार को सालाना 40 हजार करोड़ रुपये के टैक्स के रूप में मिलते हैं। जाहिर है इसकी जानकारी झोपड़पट्टी में रहने वाले लाखों लोगों को नहीं दी गई है। वर्ना वे भी संगठित होकर आवाज उठा सकते हैं कि शहर की तरक्की में हमारा भी हिस्सा होना चाहिए। जागरूक होना तो इस ब्लॉग को दोस्त बना लीजिए।
रवीश कुमार
ravish@ndtv.com
लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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