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मैं गरीब विधायक..

कहते हैं कि खुद झुक कर किसी को उठाने में जो सुख है, वह खुद उठकर किसी को झुकाने में नहीं। बाबू मन्ना लाल सड़क पर ठोकर खाकर गिर पड़े। मौलाना ने लपक कर उन्हें उठाया, झाड़-पोंछकर, चंद कदम उनके घर तक छोड़ आए। बोले- ‘भाई मियां, अल्ला न करे, दो चार साल बाद अपन का भी यही हाल होना है। लगता है बुढ़ापे की किताब में हर वर्क पर ठोकरें ही लिखी हैं। लद गए वे दिन जब मेरे दादा जान नब्बे की उम्र में एकदम परपेंडीकुलर चला करते थे और अपनी एक घुड़क से हम बच्चों को नेकर ढीला कर दिया करै थे। तब राष्ट्रमंडल खेलों के बिना ही बुढ़ापे में दौड़े और छलांगे लगा लेते थे। गेहूं की बोरी उठा लेते थे।..खैर।’

मुंह का पान एक जानिब गेट आउट करके बोले- ‘जमाना अब जम्प लेने लगा है। छाप दिया गया है कि केरल में विधायक का वेतन मात्र तीन सौ रुपए है। आई रिपीट. थ्री हंड्रेड ओनली। बेचारा विधायक। दस रुपए रोज पर तो पालतू पिल्ले का भी गुजारा नहीं हो सकता। गरीब विधायक इस पतीला तोड़ महंगाई में, गुजारा पानी करने को ठेले पर नारियल पानी बेचे क्या? मैं दो कौड़ी का रिटायर्ड बंदा घर बैठे आठ हजार महीना पेंशन ले रहा हूं। फिर भी नया तहमद नसीब नहीं होता। उधर बेचारा विधायक। या खुदा। हलक फाड़ने, मेजें कूटने, माइक दे मारने और दीगर जनहित के काम करने के बदले मुब्लिग तीन सौ रुपल्ली? बहोत नाइन्साफी है, रे सांभा।’

पान के अवशेष अलग थूक कर बोले- ‘सांसद बंदे हजारों लाखों के वेतन पर पिले पड़े हैं.. एमएलए तीन सौ? गुजरात में फी विधायक 21 हजार महीना, पंजाब में 12 हजार, राजस्थान में दस..केरल में 300! यह सौतिया व्यवहार क्यों भय्ये। गनीमत है कि बंदा केरल में न हुआ..और गरीब विधायक न हुआ.. जय हिन्द।’  

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