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जिंदगी और जिम्मेदारी

वह अपने लैपटॉप पर जुटे हुए थे। उन्हें पता ही नहीं चला कि उनकी टीम का एक साथी वहीं खड़ा है। अचानक उनकी नजर गई, तो वह बोले, ‘हां, मैंने तुम्हें बुलाया था। मैं अभी तक नहीं समझ पाया कि तुम क्या चाहते हो? क्या तुम्हें पता है?’

हमारी चाहत ही हमारी जिंदगी को तय करती है। हम जो चाहते हैं उसी के आसपास हमारी जिंदगी हो जाती है। यह मानना है कैलिफोर्निया में मेरिन काउंटी की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. मेरिलीन क्रीगर और डॉ. मेरी लामिया का।

चाहने के आसपास हमारी जिंदगी नहीं पहुंच पाती, तो उसमें किसकी गड़बड़ होती है? अक्सर हम बाहरी ताकतों पर अपनी नाकामयाबी थोप देते हैं। हमें लगता है कि दूसरों ने हमें अपनी मंजिल पर नहीं पहुंचने दिया, लेकिन हम खुद भी उसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। यह हमें महसूस ही नहीं होता।

यह हमारी जिंदगी है और उसके लिए हमें ही कोशिश करनी है। दूसरे हमारी मदद तो कर सकते हैं, लेकिन बाकी सब हमें ही करना है। सो, अपनी जिंदगी की हर चीज के लिए हमें जिम्मेदारी लेनी होगी। और जब हम उसके लिए पूरी जिम्मेदारी लेते हैं, तो शिकवे-शिकायतों के चक्कर में नहीं पड़ते।

अगर कोई हमारी मंजिल में रुकावटें पैदा करता है, तो हम कुछ वक्त के लिए रुक सकते हैं। अगर हम उन रुकावटों से रुक जाते हैं, तो यह भी हमारी ही गड़बड़ है। आखिर हमने उस रुकावट से पार पाने के लिए क्या किया? हम चाहते तो बहुत कुछ हैं, लेकिन उसके लिए जो भी करना जरूरी होता है, उसे नहीं करते। हम जिस बेचैनी से किसी चीज को चाहते हैं, उतनी कोशिश नहीं करते। कोशिश में कमिटमेंट की कमी होती है। इसीलिए अगर हमें अपनी जिंदगी चाहिए, तो उसकी समूची जिम्मेदारी हमें लेनी चाहिए।

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