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कोयले की चमक

सफलता तो पहले से ही तय थी। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड पहली बार पूंजी बाजार में उतर रही है, इसकी घोषणा होते ही बाजार ने उसके स्वागत में तोरण द्वार सजा दिए थे। कोल इंडिया भले ही सरकारी कंपनी लेकिन बाजार के हिसाब से उसके वित्तीय आधार काफी पुख्ता हैं।

भारत में कोयले का अभी काफी भंडार है और उसके एक बड़े हिस्से पर कोल इंडिया का कब्जा है। निजी कंपनियों को भारत में कोयले के खनन की इजाजत नहीं है, इसलिए उसके कारोबार के लिए कोई चुनौती भी नहीं है। देश में हालांकि ऊर्जा के तमाम विकल्प मौजूद हैं, लेकिन कोयले की मांग में न तो कोई कमी आई है और न ही निकट भविष्य में आने वाली है यानी वर्तमान से लेकर भविष्य तक उसका ऊपर जाना लगभग तय है।

फिर कोल इंडिया का यह आईपीओ जिस वक्त बाजार में आया है, वह भी उसके अनुकूल है। पूरी दुनिया को भारत के शेयर बाजार में सबसे ज्यादा संभावनाएं दिखाई दे रहीं हैं, जिसके चलते संस्थागत विदेशी निवेश काफी तेजी से बढ़ा है। इस निवेश ने शेयर बाजार को नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया है।

शेयरों की कीमतें ज्यादा हैं, ऐसे में कोल इंडिया का यह इश्यू एक अच्छे विकल्प के रूप में सामने आया है और तकरीबन सभी तरह के निवेशक इसका भरपूर फायदा उठाने निकल पड़े हैं। यह स्वागत सिर्फ कोल इंडिया को ही मिला हो ऐसा नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के बांड इश्यू को भी निवेशकों ने हाथों हाथ लिया है। पहले ही दिन यह इश्यू 17 गुना ओवरसब्सक्राइब हुआ।

स्टेट बैंक देश का सबसे जाना-माना ब्रांड है और सिर्फ निवेशक ही नहीं, आम भारतीय भी इसे सबसे ज्यादा विश्वसनीय मानता है। कोल इंडिया के विपरीत स्टेट बैंक ऐसे बाजार में सक्रिय है, जहां इन दिनों भारी स्पर्धा है, लेकिन फिर भी इस बैंक ने अपनी हैसियत और कारोबारी बढ़त को बनाए रखा है।

कोल इंडिया लिमिटेड और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के इश्यूज़ की सफलता क्या कहती है? एक तो यह कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को सिर्फ सरकारी मानकर ही नहीं खारिज किया जा सकता। और दूसरे यह कि इनमें जो अच्छी कंपनियां हैं, जिनमें अच्छी संभावनाएं हैं, पूंजी बाजार उनके स्वागत के लिए तैयार खड़ा है। 

इसलिए अब उस व्यवस्था को बदल देना चाहिए, जिसमें ये कंपनियां अपने कार्य विस्तार के लिए सरकारी संसाधनों की बाट जोहती हैं। इन कंपनियों को जनता से उगाहे गए करों की नहीं, अपनी संभावनाओं से अर्जित पूंजी की जरूरत है।

जरूरी है कि इन कंपनियों को व्यावसायिक बनाया जाए। उन्हें सरकारी लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर चलाने के बजाय अपने पांवों पर खड़ा किया जाए और बाजार की स्पर्धा के लायक बनाया जाए। स्टेट बैंक और कुछ अन्य कंपनियों की सफलता इसका अच्छा उदाहरण है।

यह ठीक है कि सार्वजनिक क्षेत्र की सभी कंपनियां ऐसी नहीं हैं। बहुत-सी ऐसी हैं, जो पूरी तरह सफेद हाथी हो चुकी हैं और उनका संचित घाटा उन्हें लेकर कोई उम्मीद नहीं जगाता। ऐसी कंपनियां अगर पूंजी बाजार में आएं तो शायद कोई उनके स्वागत को आगे नहीं आएगा, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की जिन कंपनियों में सचमुच संभावनाएं हैं, उन्हें कौन- सा रास्ता अपनाना चाहिए, यह कोल इंडिया और स्टेट बैंक ने बता दिया है।

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