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टिकटिंग के क्षेत्र में करियर बुकिंग

वक्त की बदलती रफ्तार ने बहुआयामी करियर विकल्प भी तेजी से खोले हैं। खासतौर पर इंटरनेटी सुविधाओं ने तो इस दिशा में गजब का काम किया है। आज ऑनलाइन विश्वसनीय शॉपिंग जहां संभव है, वहीं अन्य व्यवसायों में भी पारदर्शिता बढ़ी है और उपभोक्ताओं के हित सुरक्षित हुए हैं। ऐसा ही क्षेत्र ई-टिकटिंग का भी है।

रेलवे में इसका लोग बखूबी इस्तेमाल करने लगे हैं। टिकट रिज़र्वेशन की ऐसी ही सुविधा अब खेलों, फिल्मों और बड़े-बड़े इवेंट्स के लिए भी होने लगी है। भारत में भी अब बड़े-बड़े खेल, संगीत व फिल्म के महाआयोजन होने लगे हैं। इस प्रक्रिया में आयोजन स्थल तक लोगों की पहुंच को सुनिश्चित करने के लिए विश्वस्तरीय टिकटिंग मानकों को अपनाकर बिजनेस को विस्तार देने का प्रयास किया जाता है। भारत जैसे देश में जहां फिल्मी टिकटों की गिनती दूसरी सबसे बड़ी कंज्यूमर गुड्स के रूप में की जाती है, वहां खेलों में टिकटिंग के क्षेत्र में करियर बनाने की बड़ी संभावनाओं ने जन्म लिया है।

इसकी शुरुआत तो विदेशी कंपनियों ने की थी, पर अब भारतीय व्यवसायी भी इसमें जुटने लगे हैं और काफी हद तक कामयाब भी हो रहे हैं। इनमें से ही एक क्याजूंगा को भारत की पहली फिल्म, क्रिकेट, मनोरंजन और स्पोर्ट्स टिकेटिंग कंपनी होने का श्रेय दिया जाता है। 2007 से भारत में स्थापित इस कंपनी ने बेहद कम समय में अपनी पहचान बना ली है।

कंपनी की सह निदेशक नीतू भाटिया की मानें तो इसका पूरा श्रेय महत्वपूर्ण आयोजनों तक लोगों की आसान पहुंच बनाने के कंपनी के प्रयास को जाता है। टिकटिंग के क्षेत्र में यह काफी महत्वपूर्ण है। वे बताती हैं कि बदलती जीवनशैली और उसमें तकनीक का प्रवेश इस क्षेत्र में काफी बदलाव लाया है।

कंपनी की शुरुआत से ही यह कोशिश रही कि वह देश में उपभोक्ताओं के लिए फिल्म व खेल मनोरंजन के अनुभव को बिना बाधा के उपलब्ध कराए। फिल्म ई-टिकटिंग के क्षेत्र में काम कर रही कंपनियां अपनी वेबसाइट पर एडवांस में फिल्मों की समीक्षा करने, फिल्म चुनने और समय और स्थान की अपनी योजना बनाने में मदद कर रही हैं।

ऑनलाइन, मोबाइल, बॉक्स ऑफिस व रिटेल वितरण आउटलेट्स आदि विभिन्न माध्यमों से भुगतान के विकल्प ने ई-टिकटिंग के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं के लिए नई संभावनाओं को जन्म दिया है। ऐसी कंपनियां आजकल अपनी रेंज बढ़ाने के लिए विभिन्न अग्रणी रिटेल आउटलेट्स, से भी संपर्क साधती हैं।

इसके अलावा, विभिन्न मल्टीप्लेक्स ऑपरेटर्स, क्रिकेट एंड फ्रेंचाइजी, कंसर्ट प्रमोटर्स और इवेंट ऑर्गेनाइजर के साथ हाथ मिलाती हैं, जिससे कंपनी की अधिक से अधिक बड़े इवेंट्स की टिकट की उपलब्धता को सुनिश्चित करने में मदद मिले। 40 शहरों से काम कर रही इस कंपनी की सफलता को ऐसे से भी समझे सकते हैं कि 2008 के आईपीएल सीजन में कंपनी ने कई टीमों के टिकटिंग पार्टनर के तौर पर टिकट मास्टर के साथ काम किया।

पिछले दो से तीन वर्षो में देश में स्पोर्ट्स व एंटरटेनमेंट टिकटिंग के कॉन्सेप्ट में काफी बदलाव आया है। पहले यह क्षेत्र पूरी तरह से स्पोर्ट्स आयोजकों और इवेंट प्रमोटर्स के हाथ में होता था। आसान टिकटिंग को आय के माध्यम और उपभोक्ता से संपर्क जैसे महत्वपूर्ण और प्रत्यक्ष मुद्दे से बहुत कम जोड़कर देखने की कोशिश की जाती थी, पर आईपीएल जैसे बड़े आयोजनों ने इस संबंध में आयोजकों व प्रमोटर्स समेत सामान्य जन की सोच में भी काफी बदलाव किया।

जब भी प्रवेश टिकट को प्रमुख आय के स्रोत के तौर पर गिना जाता है, उस स्थिति में इस प्रक्रिया से जुड़ी सभी खामियों पर नियंत्रण करते हुए इसके मौद्रिक महत्व को तरजीह दी जाती है। टिकटिंग की केंद्रीकृत व्यवस्था टिकटिंग व्यवस्था को अधिक से अधिक पारदर्शी बनाते हुए इस माध्यम से होने वाली आय को बढ़ा देती है।

नीतू बताती हैं कि उन्होंने जब शुरुआत की तो कुल तीन लोग थे, पर अब कंपनी में 35 लोग हैं। इन दिनों कंपनी फिल्मों के अलावा वर्ल्ड कप के लिए एडवांस टिकटें बुक कर रही है। यह कारोबार मात्र तीन साल में 30 गुना बढ़ा है। जो लोग इस व्यवसाय से जुड़ना चाहते हैं उन्हें कंप्यूटर-नेट फ्रेंडली होने के साथ हिन्दी अंग्रेजी का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए। मार्केटिंग सिनेमा और खेलों में अभिरुचि भी इस दिशा में आगे बढ़ने में मददगार हो  सकती है।  

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