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चीन और अमेरिका के बीच शीतयुद्ध

कहते हैं कि राजनीति में न तो कोई किसी का स्थायी मित्र होता है और न स्थायी शत्रु। केवल हित स्थायी होते हैं। यह बात अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा कारगर है। अमेरिका और वियतनाम वर्षो लड़ते रहे। अंत में अमेरिका को बहुत ही बेआबरू होकर वियतनाम से हटना पड़ा, परंतु अमेरिका ने राजनीति की सच्चाई को पहचाना। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद रूस पूरी तरह पंगु हो गया था। रूस के साथ-साथ पूर्वी यूरोप के अन्य साम्यवादी देश भी ध्वस्त हो गए थे, परंतु चीन अकेला ऐसा साम्यवादी देश था, जो न केवल सीना तानकर खड़ा रहा, बल्कि जोर-जबरदस्ती करके एशियाई देशों को डराता-धमकाता रहा।

चीन की ‘दादागिरी’ पर काबू पाने के लिए अमेरिका ने वियतनाम से दोस्ती गांठी। वियतनाम ने भी अपने सबसे निकटतम मित्र सोवियत रूस को ध्वस्त हो जाने के बाद जमीनी हकीकत को समझा और अमेरिका से धीरे-धीरे अपने संबंधों को मधुर बनाना शुरू कर दिया, खासकर आर्थिक मामलों में वियतनाम ने अमेरिका से अपने संबंध बहुत मजबूत बना लिए।

दक्षिण-पूर्व एशिया में वियतनाम ही एक ऐसा देश है जिसने सुरक्षा परिषद के तीन स्थायी सदस्यों- अमेरिका, फ्रांस और चीन को लड़ाई में हराया है। इसलिए चीन के बढ़ते हुए दबदबे को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका ने वियतनाम से दोस्ती गांठी है।

चीन की बढ़ती हुई दादागिरी से अमेरिका चिंतित है और चीन के पड़ोसी भी। जार्ज बुश के समय में एशिया में अमेरिका के मित्र देशों में यह भावना फैलने लगी थी कि अमेरिका धीरे-धीरे अपने मित्र देशों को उनकी तकदीर पर छोड़कर एशिया से निकल जाएगा, परंतु कुछ सप्ताह पहले अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने वियतनाम में कहा कि यह सही है कि पिछले 10 वर्ष में अमेरिका अफगानिस्तान और इराक में उलझा रहा, परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि वह अपने मित्र देशों को एशिया में छोड़कर भाग खड़ा होगा।

हिलेरी क्लिंटन के इस वक्तव्य से एशियाई देशों में आत्मविश्वास पनप गया है और वे अब चीन की दादागिरी का मुकाबला करने के लिए तैयार हो गए हैं। सिंगापुर के वरिष्ठ राजनेता कुवान यू कल तक चीन की तारीफ करते नहीं थकते थे, अब उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि चीन की नीयत ठीक नहीं है।

अमेरिका और सिंगापुर के नेताओं के बयान से चीन तिलमिला गया है। उसके नेता कहते हैं कि वह एशियाई देशों के साथ शांतिपूर्वक रहना चाहता है। उसने रूस और वियतनाम से सीमा समस्या सुलझा ली है। इसके जवाब में एशियाई देश अब खुलकर कह रहे हैं कि चीन ने रूस और वियतनाम के साथ सीमा समझौता इसलिए कर लिया, क्योंकि ये दोनों मजबूत देश थे और वे किसी भी हालत में एक इंच भूमि भी चीन को देने को तैयार नहीं थे, परंतु भारत जो सदा से चीन को अपना मित्र समझता था, उसकी हजारों किलोमीटर जमीन चीन ने दबा ली है। क्यों नहीं चीन इतिहास की वास्तविकता को समझता है और भारत को उसकी भूमि लौटा रहा?

हाल में साउथ चाइना सी को लेकर चीन और उसके पड़ोसी देशों में तनाव बहुत बढ़ गया है। यहां स्थित स्पार्टली द्वीप समूह पर वियतनाम, मलेशिया, फिलीपीन्स, ताइवान और ब्रूनी अपना दावा ठोक रहे हैं, जबकि चीन कह रहा है कि यह उसके प्रभुत्व क्षेत्र में आता है और वह किसी भी हालत में इन द्वीप समूहों पर इन देशों का आधिपत्य स्वीकार नहीं करेगा।

इस बीच चीन के एक मछली पकड़ने वाले जहाज ने साउथ चाइना सी में जापान के एक जंगी जहाज में जबरन छेद कर दिया। जापान ने चीनी जहाज के कप्तान को कैद कर लिया। फिर अन्य मित्र देशों की सलाह पर उसे छोड़ दिया। चीन यह कह रहा है कि जापान ने जिस तरह चीनी जहाज के कप्तान को कैद कर लिया था, उसके लिए वह बिना शर्त माफी मांगे। इसके जवाब में जापान कह रहा है कि चीन की बेशर्मी की सीमा नहीं है। चीन को जापान को भरपूर मुआवजा देना चाहिए और जिस तरह उसके जहाज ने जापानी जहाज में जानबूझकर छेद कर दिया है, इसके लिए उसे क्षमा याचना करनी चाहिए।

भारत भी चीन की विस्तारवादी नीति से त्रस्त है। भारत अपनी समस्याओं में घिरा रहा। इसका लाभ उठाकर चीन ने नेपाल पर शिकंजा कस लिया। म्यांमार में तो वह पहले से ही जमा हुआ था। हाल में श्रीलंका को भरपूर आर्थिक सहायता देकर वह उसे अपने पक्ष में कर रहा है। देखना यह है कि एशिया में जो नई तरह का शीतयुद्ध चीन और अमेरिका के बीच शुरू हो गया है, उसके अंतत: क्या परिणाम निकलते हैं।

लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं

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