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उसी में राह निकालनी है

अपनी टीम की एक मीटिंग कर रहे थे वह। तभी एमर्जेसी अलार्म बज उठा। पूरी टीम चौंक पड़ी। वह कमरे से बाहर आए और सिक्युरिटी वाले से पूछा। उसने कहा कि बिल्डिंग में आग लग गई है। और हम बाहर नहीं जा सकते।

साइकोलॉजिस्ट डेविड ईगलमैन मानते हैं कि सामने आ पड़े खतरे के वक्त हमें हड़बड़ाना नहीं चाहिए और विकल्प पर फोकस करना चाहिए। सोचना चाहिए कि जो है, सो है। और इसी में से कोई राह निकालनी है। ईगलमैन ने जबर्दस्त खतरों से जूझने वालों पर रिसर्च की है।

हम पर जब खतरा मंडराता है, तब सबसे पहले यही सोचना पड़ता है कि अब हमारे लिए क्या बचा है? यानी विकल्प क्या है? अगर हम सोच ही नहीं पाएंगे, तो कहीं के नहीं रहेंगे। इसलिए कम से कम अपनी सोच को तो पॉजिटिव बनाए रखना है। हालात निगेटिव हैं जरूर, लेकिन उससे निकलने के लिए तो पॉजिटिव अंदाज चाहिए।

जितना जबर्दस्त खतरा होता है, उतना ही ठंडे दिमाग की जरूरत होती है। हड़बड़ी से कुछ भी होने वाला नहीं है। मन शांत, तो आगे की सोच पाएंगे। अशांत होगा, तो सोचना-विचारना भी बंद हो जाएगा। सारी संभावनाएं ही खत्म हो जाएंगी। उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा।

अक्सर होता यह है कि खतरे को देख कर हमारे हाथ-पांव फूल जाते हैं। हम परेशान होते रहते हैं। हम सोच ही नहीं पाते कि उसके आगे भी जिंदगी है। हमारे दिमाग में ऊल-जुलूल विचार आने लगते हैं। हम उस हालात का सामना करने के बजाय हथियार डालने लगते हैं।

ऐसे में हम अपने को ही नहीं, दूसरों को भी निराश-हताश कर डालते हैं। लेकिन जब हम उससे जूझने की हिम्मत जुटाते हैं, तो दूसरों को भी हौसला देते हैं। फिर कोशिश से कोई न कोई राह निकल ही आती है। खतरा कोई भी हो आखिरकार राह निकलनी चाहिए।

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