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लोकतंत्र के प्रहरी

यह जरूरी है कि लोकपाल बिल पर राजनैतिक सहमति बने और वह सरकार की जवाबदेही तय करने वाली संस्था के रूप में सामने आए।

भारत में लोकपाल की अवधारणा 1966 में प्रशासनिक सुधार आयोग ने सबसे पहले सामने रखी थी। अब 2010 मेंसरकार एक ऐसा लोकपाल बिल बनाने में कामयाब हुई है, जो संभवत: सबको स्वीकार्य होगा और अगर यह संसद की मंजूरी पा सका तो आखिरकार केंद्र सरकार के लिए लोकपाल की नियुक्ति हो पाएगी।

फिलहाल 17 राज्यों में लोकायुक्त काम कर रहे हैं और जहां उनकी कुछ सफलताएं हैं, वहीं विफलताएं भी हैं। जहां राज्य सरकारें सचमुच राजकाज में पारदर्शिता और ईमानदारी के लिए फिक्रमंद हैं, वहां लोकायुक्त के साथ वे सहयोग करती हैं, उनके लिए जरूरी सुविधाएं देती हैं और उनकी सिफारिशों पर गंभीरता से काम करती हैं।

लोकायुक्त और राज्य सरकार के बीच टकराव के भी उदाहरण कम नहीं हैं, लेकिन राज्य सरकार की जवाबदेही तय करने के लिए इस पद की जरूरत और महत्व बेशक बहुत ज्यादा है। केंद्र में लोकपाल की नियुक्ति न होने के पीछे बुनियादी वजह यह थी कि केंद्र में तमाम सरकारें प्रधानमंत्री के पद को इसकी जाँच के दायरे में लाना नहीं चाहती थीं। इसलिए दस बार लोकपाल बिल का मसौदा तय हुआ और हर बार उसमें अड़ंगा लग गया।

अब की बार इस बिल के पास होने की संभावना इसलिए है क्योंकि वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की पहल पर प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को लोकपाल की जाँच के दायरे में रखा गया है। सिर्फ बाहरी और आंतरिक सुरक्षा और विदेश मामलों पर प्रधानमंत्री के फैसले इसके दायरे में नहीं आएंगे। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि इन मामलों में अक्सर ऐसे फैसले करने होते हैं या ऐसे कुछ तथ्य होते हैं जिन्हें किसी जांच के दायरे में लाना राष्ट्रीय हित में नहीं होता।

नए बिल में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा के उपाध्यक्ष वगैरा कुछ पद हैं, जो लोकपाल के दायरे से बाहर हैं। मौजूदा रूप में मोटे तौर पर लोकपाल बिल को सबकी मंजूरी मिलने में कोई समस्या होनी नहीं चाहिए।

मौजूदा बिल के मुताबिक लोकपाल तीन सदस्यीय होगा, जिसके अध्यक्ष पद पर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज या मुख्य न्यायाधीश हो सकते हैं या सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज को भी इस पद पर लाया जा सकता है। बाकी दो सदस्य सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड जज या हाई कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश हो सकते हैं।

लोकपाल को व्यर्थ के आरोप लगाने वाले को सजा देने का भी अधिकार होगा, इसलिए इस बात की कम संभावना है कि शरारतन आरोप लगाए जाएं, लेकिन ऐसे पदों का प्रभावशाली होना जितना कानूनी प्रावधानों पर निर्भर होता है, उतना ही स्थापित और मान्य परंपरा पर भी। अगर सरकार की दिलचस्पी जवाबदेही और पारदर्शिता में है, तो लोकपाल का पद ज्यादा प्रभावशाली हो सकता है।

दूसरी ओर कोई प्रभावशाली लोकपाल ऐसी परंपरा डाल सकता है, जिससे इस पद का महत्व बढ़े। मसलन टीएन शेषन के पहले और उनके बाद चुनाव आयोग के कामकाज में जमीन-आसमान का फर्क है। शेषन ने ऐसी नजीर पेश कर दी है कि उनके बाद चुनाव आयोग उसी स्तर का काम करता आ रहा है। हम उम्मीद करें कि लोकपाल बिल पास होगा और वह सरकार पर अंकुश रखने वाली महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक संस्था बन पाएगी।

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